दोहे
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चाय और वो जब मिले,जन को दोनों साथ।
बाग बाग दिल हो उठे, आगे बढ़ता हाथ। 2।
होता प्रसन्न मन कभी,मुख से निकले वाह।
पुलकित जन देता दुआ, वो भूलेगा आह। 4।
खुशी मिले संसार में, जीवन स्वर्ग समान।
कहे सफल वो जिंदगी, मानव वही महान। 6।
महान जन वो जगत में,पुण्य कर्म हो काम।
चाय और वो संग हो, मिले दूर तक नाम। 8।
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माटी का घर
विधा-मुक्तक
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1
माटी का घर सदा, लगता जन को प्यारा।
रहते जिसमें लोग, नेह लगता हमारा।।
सभी जन प्रसन्न मिलते, अपने अपने घर,
जिसके ना माटी घर , कहाता बेचारा।।
2
कभी कभार मिलते थे, माटी के घर।
अपना घर होता जब, नहीं होता डर।।
सदा खुशी से रहता, हर जन संसार,
घर जिनका हो नहीं, भटकेगा दर दर।।
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गीत
शरद पूर्णिमा रात अमृत बरसता
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शरद पूर्णिमा रात अमृत बरसता
आओ मिलकर खाएंगे सब खीर,
औषधियों का यही काम करेगी
हट जाएगी तन की सारी पीर,
शरद पूर्णिमा...................।
एक वर्ष बीते आती है रात,
शरद पूर्णिमा यही कहलाती है,
सर्दी मौसम आरंभ होता है,
मन में उमंग एक भर जाती है,
इस रात को देख देखकर लगता,
प्रसन्न होते खूब जन और वीर.
शरद पूर्णिमा...................।
श्रीकृष्ण ने बताया बड़ा महत्व,
भवानी का हुआ था तब अवतरण,
कार्तिक नहान शुरू हो जाएगा,
पर्व लगता जैसे होता है रण,
कार्तिक स्नान करती नारी मिलके,
पर मन में रखती सदा एक धीर,
शरद पूर्णिमा...................
सर्दी मौसम शुभारंभ होएगा,
सभी तन मन को प्रसन्न कर जाये,
लगता हँसाये जन को हर्षाये,
मन यह कहे शरद पूर्णिमा आये,
सुंदर सुहानी जब चंद्रमा देख,
खुश होते हैं सभी गरीब अमीर,
शरद पूर्णिमा.....................।
शरद पूर्णिमा रात अमृत बरसता
आओ मिलकर खाएंगे सब खीर,
औषधियों का यही काम करेगी
हट जाएगी तन की सारी पीर,
शरद पूर्णिमा...................।
कविता/हास्य रस
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नया नया चश्मा पहना,
वो चल पड़ी बाजार,
बगल बैग टांग लिया,
कुत्ते से था बड़ा प्यार।
काला चश्मा पहना जब,
छुपा लिया दिल में राज,
सामने एक घर देखकर,
बोली कितना सुंदर ताज।
काले चश्मों से कम दिखे,
सामने कार से जा टकराई,
कार से उतरी एक बूढ़ी तो,
चोट तो नहीं लगी लुगाई।
काले चश्मे वाली खड़ी हो,
जोश में आ गई वो भारी,
दोनों बाजू ऊपर कर लिये,
लडऩे की कर ली तैयारी।
भीड़ जमा हो गई वहां पर,
टूटा चश्मा लेकर वो हाथ,
बोली मेरा चश्मा तोड़ा है,
तुझ को मैं कर दूंगी अनाथ।
टूट पड़ी बूढ़ी औरत पर,
उतारा अपना सारा जोश,
अपनी गलती छुपा रही,
बता रही बुढिय़ा का दोष।
समझा बूझाकर भेजी घर,
खरीददारी ना हो पाई तो
आ पहुंची कुत्ते सहित घर,
जान बची रट रही हर हर।।






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