Sunday, October 04, 2020

सत्य अहिंसा
विधा-दोहे
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सत्य अहिंसा जगत में, कठिन डगर ले जान।
बापू गांधी जब चले, बढ़ा जगत सम्मान।।

सत्य अहिंसा मान ले, तलवार की है धार।
पर जो इस पथ पर चले, उसको मिलता प्यार।।

सत्य अहिंसा पर टिका, सच्चाई का भार।
जप तप इनको मान ले, करो सदा ही प्यार।।

सत्य अहिंसा वो डगर, मिलते कष्ट अपार।
जो अपनाता जिंदगी, मिले जहाँ का प्यार।।

सत्य अहिंसा कह रहे, ये जीवन आधार।
कठिन डगर हैं मान ले, फिर भी कर ले प्यार।।


दोहा-सुधाकर
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देख सुधाकर आसमाँ, लगे सुहानी रात।
विभोर करती पूर्णिमा, तारों की बारात।।




पर्यावरण बचाओ/कविता
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दिनोंदिन नष्ट हो रहा ,        .        
इंसान बना है दुश्मन,
पर्यावरण को बचाओ,              
बच जाएगा तन-मन।

पवन हो गई प्रदूषित,
जीना हो गया हराम,
यूं ही प्रदूषण बढ़ा तो,
छिन जाए चैन आराम।

प्रकृति में जब पैदा हुए,
प्रकृति से बड़ा नाता है,
पर्यावरण दूषित करके ,
मन दुखी, हो जाता है।

सोच ले अभी है वक्त,
वरना फिर पछताएगा,
जीवन नष्ट हो जाएगा,
मानव नहीं बच पाएगा।

 लगा पेड़ पौधे अधिक,       
 जीवन सफल हो जाएगा,
 वरना वह दिन दूर नहीं ,
 जन मिट्टी में मिल जाएगा।
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विषय- पवन/समीर/अनिल/वात/हवा..इत्यादि
विधा-कविता
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पवन चली सुहानी, मन हुआ विभारे,
भीनी भी खुशबू, भंवरे लगे चित्तचोर,
कभी हवा के वेग से, पत्ते गा रहे गीत,
ठंडी ठंडी हवा में, मन लगता है मीत।

समीर सुहानी भोर की, मन होता खुश,
प्रदूषित हवा कही, मन को होता दुख,
कभी कभी पवन वेग, करदे बुरा हाल,
लगता है मौसम ने, बदली अपनी चाल।

हवा किसी को लगे, बोलना करे बंद,
हवा बुरी जब आये, चाल  चले मंद,
वात ऐसी हो जगत, मन हो जाए खुश,
दुख दर्द जहां मिटे, रहे नहीं कोई दुख।




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