दोहा ************************
**********************************
*************************
सुबह शाम रत काम मेें, मिले नहीं अवकाश।
करे जागरण रात दिन, फिर भी मिले निराश।।
झलक कभी मां की पड़े, कष्ट सभी हो दूर।
रोग दोष सब दूर हो, तन का मिटे गरूर।
स्कंद को जन्म जब दिया, स्कंदमात है नाम।
जन कल्याणी भावना, दर्द मिटाना काम।।
***********************
दोहा शब्द-जागरण
*************************
सुबह शाम रत काम मेें, मिले नहीं अवकाश।
करे जागरण रात दिन, फिर भी मिले निराश।।
****************************
मां स्कंदमाता
विधा-दोहे
*************************
मात स्कंद को देखकर, मिटे मन के विकार।
एक झलक के सामने, बने जीत जो हार।।
रूप सुहाना स्कंद मां, करती जन कल्याण।
भक्तों के मन में बसी, जीवों में है प्राण।।
झलक कभी मां की पड़े, कष्ट सभी हो दूर।
रोग दोष सब दूर हो, तन का मिटे गरूर।
स्कंद को जन्म जब दिया, स्कंदमात है नाम।
जन कल्याणी भावना, दर्द मिटाना काम।।
भक्ति में शक्ति
विधा-कविता
*************************
भक्ति में होती शक्ति, कर दे बेड़ा पार,
प्रभु का आशीर्वाद मिले, नहीं हो हार,
भक्त के दर्द दूर करने, प्रभु रहते तैयार,
झटपट विपत्ति दूर करे,ना रखते उधार।
भक्ति में वो शक्ति हो,पूरा हो हर काम,
पल में ऊंचा नाम हो, चाहे था बदनाम,
प्रभु चाहे सुबह होगी, ईश्वर चाहे शाम,
सभी पाप अब छोड़कर, लो ईश्वर नाम।
कितने पापी हुये जग में, बेड़ा हुआ पार,
रत्नाकर को मिले नारद,प्रभु भक्ति तैयार,
ऐसी भक्ति कर डाली, हो गया बेड़ा पार,
वाल्मीकि कहलाया वो, लेते नाम हजार।
बाघेश्वर धाम पर, राजा दलीप लौ जगाई,
महर्षि वशिष्ठ ने ,शिवभक्ति उनमें लगाई,
जप तप शिव करके, मिला पुत्रों वरदान,
आज तक रघुकुल की बनी हुई पहचान।
कात्यायन ऋषि की, जागी मां से आस्था,
पुत्री रूप में पाना चाहा, मां से था वास्ता,
त्रि-देवों ने ऋषि को,दे दिया पुत्री वरदान,
कात्यायनी ने जन्म लिया,रखी ऋषि आन।
भक्त प्रह्लाद विष्णु भक्त, चाहता दर्शन रूप,
हिरण्याकश्यप तात थे, कहलाते थे वो भूप,
पर भक्ति के आगे,खंभे में ही लिया अवतार,
हिरण्याकश्यप वध किया, प्रह्लाद को प्यार।
पार्वती मां शिव पाने को, भक्ति में थी लीन,
खाना पीना छोड़ दिया, पत्ते खाती थी तीन,
भक्ति में वो खोई पत्ते भी खाना छोड़ दिया,
अर्पणा नाम पड़ा मां का, शिव मिला पिया।
पूर्व जन्म में राजा बलि,था प्रसिद्ध जुआरी,
पाप बुहत करता, शिव भक्ति लगती प्यारी,
भक्ति में शक्ति जगी, खिली थी सुख कलि,
फिर जब वो जन्म लिया, बना राजा बलि।
दस शीश की बलि दी, रावण वो कहलाया,
उसकी भक्ति में शक्ति से, बड़ा वरदान पाया,
शिवलिंग लेकर जब चला,रख डाला धरती,
वैजनाथ धाम बना, प्रकृति वहां दुख हरती।
भागीरथ की भक्ति से, शिव ने गंगा उलझाई,
अपनी जटाओ ंमें समेटा,फिर धरा पर गिराई,
सगर पुत्रों का तर्पण हुआ, गंगा वो कहलाई,
कितने पापी पाप नष्ट कर, गंगा बहुत हर्षाई।
महाकवि विद्यापति की थी, शिव की भक्ति,
शिवभोले उनके नौकर बने,देखी तब शक्ति,
उग्रनाथ महादेव मंदिर, बिहार में बड़ा धाम,
भक्त खातिर खाई लाठियां, कष्ट सहना काम।
कितने अजामिल पार उतरते, भक्ति में शक्ति,
पाप करने छोड़ दो, ले लो आज ही विरक्ति,
प्रभु के लिए भक्त बड़ा हो, कहते आये संत,
प्रभु भक्ति में लीन हो जाए, होता नहीं अंत।
मन से भक्ति की जिसने, मिला उसे वरदान,
पूरे जग में नाम हुआ, बनी थी बड़ी पहचान,
परहित का काम करो, प्रभु का करो गुणगान,
चुगली चाटा छोड़कर, लगा लो प्रभु में ध्यान।।
*************************
*****************
नवदुर्गा
विधा-घनाक्षरी/मनहरण
**************************
1
हाथ जोड़कर करते, विनती हे मेरी मात,
बहुत दर्द अब झेला, मुझे गले से लगाइये,
दुख में बीते दिन , तुम बिन हूं अनाथ,
यही अब है अरदास, घर मेरे आइये।
2
दर्शन को प्यासे नवदुर्गा,कर रहे है अरदास,
हाथ जोड़ते हैं मात, एक बार घर आइये,
बहुत दिनों से परेशान, कभी सुन लो विनती,
नवरात्रे पर्व चल रहे, दर्शन दे जाइये।
***************************



No comments:
Post a Comment