मां चंद्रघंटा
विधा -दोहा
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चंद्रघंटा कहे सुनो, मानों कभी न हार।
देवी मैं अवतार लूं, कर दूं बेड़ा पार।।
देख सलोना रूप मां, पाप मिटे तन आज।
तीन जहां के लोक में, मां देवी का राज।।
कृपा सदा ही राखियों, विनति करूं मैं दास।
मां आशीर्वाद की, थोड़ी सी अरदास।।
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कहा है-
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सपने तो सपने हो, मत एतबार कर।
सपनों से नहीं,हकीकत से प्यार कर।।
फिर कहूंगा-.....................
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ऐ काश! ऐसा हो, मां तू घर आये।
धन दौलत नहीं, मां के दर्शन पाये।।
जब सपना टूटेगा तो कहूंगा-......
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भर दे मां झोली, कंगाली में जीता हूं।
मां तेरे दर्शन के लिए, बस जीता हूं।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़, हरियाणा
ताटक छंद
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चारों पद 16-14 तथा पदांत तीन गुरुओं से
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कैसे होता माता का व्रत,लो आज बतलाऊंगा।
जब तक चलते हैं नवरात्रे , खाना तक ना खाऊंगा।
मैं माता को प्रतिदिन अपने, सदा मंदिर बुलाता हूं।
कितने दिन उपवास चलेंगे, आज तुमको बताता हूं।
नहा धोकर ही पूजा करो, कहते आये सभी लोग।
उपवास करते रहना कभी, नहीं होगा कोई रोग।
नौ दिनों तक चलते रहेंगे, कहो माता नवरात्रे,
उपवास जीवनभर ही करो, यही कहलाए संजोग।।
आसमां
मुक्तक
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1
आसमां से हो रही, देखों आज बरसात।
किसान प्रसन्न हो रहे, मौसम देता साथ।
फसल उगाकर किसान भर रहे अपना पेट,
मेहनत में कसर नहीं, करे मेहनत दिनरात।।
2
आसमां भी रोता है, जब हो कोई शहीद।
दिन रात रक्षा करे वो, होली हो या ईद।।
शहीदों के बल पर लेते हवा में हम सांस,
देश उन्नति करे , पूरी लगती जन उम्मीद।।
गम में वो रवानी है
कविता
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जहां के गम में वो रवानी है,
वो लगे तेरी-मेरी कहानी है,
कभी शबनम सी जवानी वो,
कभी झील में रुका पानी है।
जहां के गम में वो रवानी है,
लगे हथिनी कोई मस्तानी है,
कभी आंखों का आंसू मान,
बस छोटी सी यह कहानी है।
कभी बने रूप यौवन शृंगार,
कभी बनती गले का वो हार,
कभी बना दे जन की चिता,
लगती मौजों की रवानी है।
कभी बदली सी भिगोए तन,
कभी उत्साह भर दे तन मन,
कभी रो-रो बिताते जो रात,
मिलती गम में वो रवानी है।
चार दिनों की, जिंदगानी है,
जिंदगी लगे बड़ी सुहानी है,
गम अरु खुशी से भरी खूब,
नदी में लगे, बहता पानी है।
गमों में मिलती वो रवानी है,
कभी आज यहां, कल वहां,
कभी श्री कृष्ण सा बने रूप,
कभी मीरा सम, दीवानी है।
अंगारों पर, चलते है लोग,
तब दर्द करता मनमानी है,
फूलों पर रखों, कभी पांव,
लगती अजब जिंदगानी है।
जन्म लिया इंसान ने जब,
बच्चे की सूरत मस्तानी है,
हुआ बाल रूप में जब वो,
अल्हड़ सी लगे जवानी है।
कभी जिंदगी मस्त हाथी है,
कभी लगती प्रिय साथी है,
कभी दुश्मन सी लगती वो,
कभी लगे, अपनी नाती है।
कभी राधा सी, प्यारी बन,
श्रीकृष्ण संग मिल जाती है
कभी सीता सी बनकर वो,
वन वन राम संग जाती है।
कभी लैला रूप सुहानी है,
कभी मजनूं की दीवानी है,
कभी शीरी फरियाद बनती,
बनती दर्द में वो रवानी है।
कभी सोहनी बन गाती है,
कभी महिवाल कहानी है,
कभी बनकर फूल खुशबू,
कलियों में, छुप जाती है।
कभी गम में वो रवानी है,
कभी तालाब का पानी है,
कभी स्थिर बनते विचार,
ऐसी एक झील सुहानी है।
जैसे धर्म कर्म हो इंसान,
कभी पाप कर्म बने जन,
कभी रोता आये बचपन,
कभी लगे खुश करे मन।
मिले गम में वो रवानी है,
लगती राजा, की रानी है,
कभी शोले की कहानी हैं,
वो शबनम सी जवानी है।
कभी शीतल पवन समान,
कभी नभ सी ऊंची शान,
कभी पाताल सी गहरी है,
जिंदगी कभी दर्द ले मान।
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चाहत
विधा-कविता
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चाहत पैदा हो, इंसान में कभी,
खाना पीना जाता है, जन भूल,
कभी गलियों में मारा मारा फिरे,
कभी कभी तो फांकता वो धूल।
चाहत हर जीव में,पैदा हो जरूर,
चाहत का चक्कर, कर देता गरुर,
चाहत का पैदा हो,ऐसा वो सरूर,
दर्द बहुत सताए, जब चकनाचूर।
चाहत की डोर, सांसों की लड़ी,
किस्मत का मिलन,सुख की घड़ी,
मुश्किल से मिलती हैं, इंसान को,
देखकर दबा नहीं सके जुबान को।
चाहत के किस्से, छपते अखबार,
पर चाहत के आगे,नहीं माने हार,
चाहत वो चीज, नहीं मिले उधार,
चाहत के आगे फीका सब बेकार।
चाहत जरूर रखो,दिल रहे जवान,
चाहत के आगे, आते बहुत तूफान,
चाहत पूरी हो जाए, संतुष्टि मिलती,
तब जाकर देश में, कलियां खिलती।।





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