कुशलक्षेम
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कुशलक्षेम जन पूछते, होता जब बीमार।
जल्दी से वो ठीक हो, करते दुआ हजार।।
जीवन जन को यूं मिला, करे भलाई काम।
मृत्यु कभी इंसान की, अटल सत्य है नाम।।
जीवन चलना नाम है, रुकना मौत निशान।
लगातार जन काम से, बनती जग पहचान।।
अनजान हूं खुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुद से
विधा-कविता
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सत्य यही है परिवार की पहचान हूं,
अपने गुणों अवणुणों से अनजान हूं,
मैं क्या हूं यह तो बतलाएगा जमाना,
पर हकीकत है मैं खुद से अनजान हूं।
लड़ी हैं लड़ाइयां अमीरों से कसम से,
ढका है निज तन बस सस्ते कफन से,
गोलियों में रुका हूं नहीं भागा युद्ध से,
जग बताये-मैं तो अनजान हूं खुद से।
लिखता रहा हूं जमाने की हर घटना,
कभी तो सूखे पत्तों की तरह सिमटना,
कभी फूलों की खुशबू सी पहचान हूं,
ये भंवरा बताए मैं खुद से अनजान हूं।
दौड़ता हूं हवा को पकडऩे की खातिर,
मैं यह मान लूं कि जग में बलवान हूं?
मुझमें कितनी ताकत मिल सकती अब,
जमाना बताएगा मैं खुद से अनजान हूं।
शायराना अंदाज जरूर रखता हूं मन से,
बेहद प्यार रखता हूं बस निज वतन से,
बेशक मैं समझूं अपने को कवि बेहतर,
ये लोग बताएंगे- मैं खुद से अनजान हूं।
धोखा खाया हैं नहीं दिया धोखा जन से,
मदद करता हूं असहाय की निज मन से,
शांति का पाठ सीखा है महात्मा बुद्ध से,
फिर भी जग कहे-मैं अनजान हूं खुद से।
चरित्र को गिरने ना दिया माना इसे हीरा,
मन मौजी रहा हूं समझा खुद को फकीरा,
दरियादिली और कष्टों का भरा मकान हूं,
जन बताएं क्या हूं-मैं खुद से अनजान हूं।
नहीं पास मेरे तोप है नहीं रखता तलवार,
कविता मुझे आती नहीं,मैं हूं एक पत्रकार,
अज्ञानी कहलाता हूं जग में नहीं विद्वान हूं,
आप कहो क्या हूं-मैं खुद से अनजान हूं।
दुख मिटाने को आया हूं,गम का मारा हूं,
माता पिता,पत्नी छोड़ गये हैं,यूं बेचारा हूं,
धर्म कर्म किये बहुत हैं, नहीं मैं शैतान हूं,
तुम ही बताओ-मैं तो खुद से अनजान हू।
मेहनत से कमाया है,मिला वैसा खाया है,
उस प्रभु को याद रखा दिल में बसाया है,
देखे मेरे चेहरे को,लगता मैं बेसुरी तान हूं,
हकीकत बताए जन-मैं खुद से अनजान हूं।
मंजिल मेरी दूर है,अभी अति दूर ठिकाना,
भारत मां पुकार रही तुम्हें,देश को बचाना,
दुश्मन जरा सुन ले, मैं चक्रवाती तूफान हूं,
दुश्मन बताएंगे-मैं क्या हूं,खुद अनजान हूं।
मां कसम है,मैं एक दिन दुश्मन से भिडूंग़ा,
बरते जो भेदभाव,मैं सरेआम उनसे लडूंग़ा,
जो मांगे मुख से उनका, मैं बस वरदान हंू,
दिल से बताओ तुम-मैं खुद से अनजान हूं।
देश में भारत, उन्नत रहे सदा इसका भाल,
नहीं दुश्मन कभी छू पाये,ना छूये महाकाल,
सभ्यता संस्कृति महान,तुलना करो शुद्ध से,
खुद ही बताओ-मैं तो अनजान हूं, खुद से।।
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माहिया
विधा-काव्य
मात्राएं-12+10+12
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तुम मिलकर चले गये
पूछा नहीं हाल
छोड़ा हमें बदहाल।
मना रहे हैं तुमको
नखरे हैं निराले
नयना काले काले।
क्यों दूर छुप रहे हो?
क्या हुई है खता?
कभी तो हमको बता।





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