चराग-ए-रहगुजर
दोहे
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हैं चराग-ए-रहगुजर, दीपों का त्योहार।
मिले मुहब्बत कामिनी, दामन भरदे प्यार। 2।
प्यार-ओ-तमन्ना कभी,रखता नहीं उधार।
वो चराग-ए-रहगुजर, गुजरे लोग हजार। 4।
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माटी का घर
दोहे
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माटी का घर जब मिले,तन में आये जान।
पूर्वज रहते थे जहां, इतनी सी पहचान।।
माटी का घर समझ ले, अपना तन मन जान।
एक दिन शाम ढूंढकर, ले जाएगी मान।।
माटी का घर दे सदा, खुशियों का त्यौहार।
ऐसे घर में ही मिले, अनमिट जन का प्यार।।
माटी का घर यह कहे, कर ले अच्छे काम।
पाप कर्म करता कभी, हो जाये बदनाम।।
जरा सुनो
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प्रदूषण का सतर बढ़ता ही जा रहा है जो भविष्य में खतरे का संकेत होगा।
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पूरी ताकत से करो, दुष्ट पर सदा वार।
टुकड़े टुकड़े तन करे, गर हिम्मत तलवार।।
चोरी डाका लूटना ,शर्मनाक हैं काम।
पाप पुण्य की सोच से, होता जन का नाम।।
देख भावना जगत की, पड़ा सोच में आज।
मूर्ख लोग ही कर रहे, इंसानों पर राज।।
विषय-चराग-ए-रहगुजर
-दोहे
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हैं चराग-ए-रहगुजर, दीपों का त्योहार।
मिले मुहब्बत कामिनी, दामन भरदे प्यार। 2।
प्यार-ओ-तमन्ना कभी,रखता नहीं उधार।
वो चराग-ए-रहगुजर, गुजरे लोग हजार। 4।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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परिंदा
विधा-कविता
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उड़ रहा था नभ में,
स्वतंत्र होकर आज,
कहां जाना उसको,
गहरा मन में राज।
मिलो लंबे उड़ते हैं,
आजादी बस जाये,
उनकी उन्मुक्तता को,
कोई नही रोक पाये।
परिंदे बैठे डाल पर,
गाते दिल से वो गीत,
खूब हंसते मिलकर,
समझों उनकी प्रीत।
परिंदों की दुनिया है,
बहुत बड़ा है संसार,
उनको देख समझ ले,
मिले जहां का प्यार।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
नव वधू
विधा-कविता
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नार नवेली बहुत शर्माती,
जब वो पति के घर आती,
बाबूल की भी याद सताए,
कभी रोये वो कभी हंसाये।
नारी उठाती घूंघट उसका,
हंसती गाती खुश हो जाती,
प्रसन्न होकर जन को बताए,
पटाखे सी बेटा दुल्हन लाए।
कोई उसको भाभी कहता,
कोई उसके पास में रहता,
कोई उससे करे आंखें चार,
करता कोई रात कां इंतजार।
नई वधू जब खोले पोटली,
नन्द दौड़कर आये मोटली,
देवर देख- देखकर शर्माये,
पति तो सपनों में खो जाये।
किसी का दिल देखो टूटा,
किसी ने धन दौलत लूटा,
किसी का भाग्य लो रूठा,
किसी का सपना देख टूटा।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
ओ चांद जरा जल्दी आना
विधा-कविता
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करवा चौथ का व्रत किया,
आकर प्रियतमा को सजाना,
बस एक जरूरी अर्ज तुमसे,
ओ चांद जरा जल्दी आना।
प्रियतम के लिए इंतजार है,
भूखी प्यासी रुकी सांस है,
तेरे को बस उसने पहचाना,
ओ चांद जरा जल्दी आना।
एक साल का पर्व कहाता,
सौभाग्य का प्रतीक बनाता,
तेरा रूप लगे बड़ा सुहाना,
ओ चांद जरा जल्दी आना।
सजी धजी, तुमको पुकारे,
तेरे दर्शन को कभी न हारे,
आकर इनकी लाज बचाना,
ओ चांद जरा जल्दी आना।
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प्रकृृति
विधा-कविता
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भुला नहीं सकता इंसान,
प्रकृति के बड़े हैं उपकार,
प्रकृति जीवन देती इंसान,
कर ले मानव प्रकृति प्यार।
मानव जीवन निर्भर प्रकृति,
प्रकृति पर निर्भर सारी सृष्टि,
प्रकृति ओज तेज भर देती,
समा सकती समूल समटि।
रोटी कपड़ा और मकान हैं,
प्रकृति पर निर्भर होते सारे,
प्रकृति की सुरक्षा कर लेना,
होगा यही धन भाग्य हमारे।
प्रकृति से आगे बढऩा भी,
होता है तलवार की धार,
प्रकृति में रहकर हँस लो,
हो जाएगा जन का उद्धार।
नजारे प्रकृति के लगते हैं,
इंसान को बड़े ही सुहाने,
प्रकृति की महत्ता को लो,
अब तो जग में पहचाने।।





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