Monday, October 05, 2020

 उत्कंठा
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उत्कंठा दिल में बसा, हिम्मत से लो काम।
दर्द किसी का ले उठा, होगा जग में नाम।।
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जरा सुनो
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विषय-परिवारिक रिश्तों में आधुनिकता के विघटन कितना उचित
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पारिवारिक रिश्तों में आधुनिकता का विघटन में शत प्रतिशत रोल है। रिश्ते आधुनिकता ने भुला दिये है।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

मैं तुझमें अधूरा हूं
विधा-कविता
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सृष्टि बनी जब से, हो रहा विस्तार,
कोई कुछ कहे,अटल सत्य है प्यार,
कह नहीं सकता कि जग में पूरा हूं,
हे सृष्टि सुन अब,मैं तुझमें अधूरा हूं।

बहुत बड़ा संसार है, बड़ा ये समाज,
कुछ नहीं जानता, बहुत छुपे है राज,
इंसान ताकत दिखाए, वो बूंद समान,
सागर के सामने, कैसे बनेगी पहचान।

नजर डालों जग पर,अति बड़ा मिले,
इंसान जग में रहता, तन बदन खिले,
जग के सामने इंसान कैसे होगा पूरा,
सोचिये इंसान जग में होता है अधूरा।

देश मेरा भारत है, जिसका बड़ा नाम,
इंसान देश में रहता, अपना करे काम,
इंसान देश को कहता, नजर आ रहा,
हे देश मेरे भारत, मैं तुझमें अधूरा हूं।

मातृभूमि पालती, जन होते हैं संतान,
भला मां के सामने कैसे हो जन पूरा,
धरती की गोद में कहता आज इंसान,
हे जननी मातृभूमि मैं तुझमें अधूरा हूं।

छोटी इकाई सृष्टि, कहाती है समाज,
इंसान समाज का अंग,कल व आज,
सागर है समाज, जन बूंद के समान,
जन कहे, समाज, मैं तुझमें अधूरा हूं।

ज्ञान का भरा है, अथाह धरा संसार,
इंसान वो हस्ती, मानेगा  उससे हार,
ज्ञान के सागर में, जन ज्ञान अधूरा है,
जन यूं कह रहा, मैं तुझमें अधूरा हूं।

शिवभोले बता रहे, पार्वती  को राज,
तुम मुझमें समा जाओ,बनूं पूरा आज,
अकेले में रहकर,मैं नहीं होता पूरा हूं,
हे पार्वती सुन लो, मैं तुझमें अधूरा हूं।

भक्त कह रहा प्रभु से,अति बड़े आप,
मैं तुच्छ तुम समक्ष, नहीं आपका माप,
भक्ति कर कर नहीं बन सकता पूरा हूं,
हे प्रभु मेरे! रहता मैं तुझमें अधूरा हूं।

हनुमान जी कह रहे, हे भोले मेरे नाथ,
तुम बिन जगत में बन जाऊंगा अनाथ,
अंश तेरा, मैं जग में मिलता अधूरा हूं,
आपमें समा जाऊं, मैं तुझमें अधूरा हूं।

सृष्टि का नियम होता,कोई नहीं है पूरा,
इंसान की भूल है, समझे खुद को पूरा,
बुद्धि और बल में, इंसान नहीं है पूरा,
ऐसे में वो कह रहा,मैं तुझमें हूं अधूरा।

काल खा रहा जन को, है बड़ा काल,
जब आये इंसान समक्ष, हो बुरा हाल,
काल से कह रहा सुन, मैं नहीं पूरा हूं,
हे काल देवता सुन, मैं तुझमें अधूरा हूं।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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अभिलाषा
विधा-कविता
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जन के साथ मिले आशा और निराशा,
हर इंसान की मिलती एक अभिलाषा,
जब आशा पूरी न हो जन होता निराश,
जब तक जीवन रहेगा लगी रहे आश।

सैनिक युद्ध में जाए लेकर अभिलाषा,
दुश्मन को मार गिराऊं रखता है आशा,
बलिदान से नहीं घबराए, करता नमन,
मातृभूमि रक्षा करे, दिल में अभिलाषा।

प्रेमी युगल डूब रहा ख्वाबों में दिनरात,
किसी प्रकार मिल जाए प्रेमी का साथ,
किसी प्रकार पकड़ लूं,प्रेमिका का हाथ,
खुशियों में बीते यूं, जीवनभर का साथ।

विद्यार्थी दिन रात पढ़े, रखे अभिलाषा,
असफल अगर हो, लगती उसे निराशा,
अच्छे अंकों से हो पास, मिलती आश,
प्रथम स्थान पर रहूं, होती इच्छा काश!

अभिलाषा भरा जगत, कभी होती पूरी,
कभी कभी दिखाती, सपने जन को नूरी,
अभिलाषा के बल पर,आगे बढ़ता जन,
अभिलाषा भरी रहती हर जीव के तन।।

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