जरा सुनो
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विषय- मुक्त
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रोजगार एक विकट संकट बन गया है। युवा वर्ग डिग्री लेकर सड़कों पर घूम रहे हैं। उद्योग धंधे स्थापित कर समस्या हल हो सकती है।
दोहा ************************
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ढोंगी अपने ढोंग से, दिखाते चमत्कार।
शोषण करके नारियां, डराते बार बार।।
खूब बढ़ी संचेतना, नारी समाज आज।
बहुत दर्द में जी चुकी,अब करती हैं राज।।
फोन बना है जिंदगी, करता पूरे काम।
अंग जरूरी बन गया, स्मार्ट इसका नाम।।
भूले खान पान
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युवा वर्ग मरियल बना,
भूल गये हैं खान पान,
प्रात: उठते ही चाहिए,
चाय का मग और नान।
घी मक्खन से दूर हुये,
छाछ नहीं पसंद आज,
फास्ट फूड पसंद उन्हें,
पसंद हैं मिर्च व प्याज।
भीड़ लगे युवा वर्ग की,
फास्ट फूड दुकानों पर,
बढिय़ा खाना पसंद ना,
बनाकर रखो निज घर।
तेज मसाले, चाऊमीन,
वर्गर, सेंडविच, टोस्ट,
फल सब्जी पसंद नहीं,
चाहिए बस उन्हें गोश्त।
लौटना है, देशी खाना,
खादी वस्त्र पैदल जाना,
सेहत बने गबरू जवान,
सभ्यता संस्कृति बचाना।।
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विधा-कविता
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आ गये मां नवरात्रे,
लो कर लो तैयारी,
सारे संकट दूर करे,
मां की छवि न्यारी।
फूलों की माला से,
मां का करेंगे शृंगार,
देवी करअर्चना करे
मिलेगा मां का प्यार।
पर्वों का देश भारत,
फिर आये दीवाली,
दीप जलाए मिलकर,
रात अमावस्या काली,
मांग बढ़ेगी फूलों की,
आयेगी घर में, बहार,
पर्व मनाए खुशी मनाए,
बढ़ेगा जन जन प्यार।।
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शरारत
विधा-कविता
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शरारत सूझे इंसान को,
करता उल्टे कई काम,
चलता चलता छेड़ करे,
हो जाता है वो बदनाम।
कौवा उड़ा एक पेड़ से,
दही में मारी फिर चोंच,
मारा पत्थर जन फेंक के,
खा गया वहीं पर गौत।
चलते चलते शोर किया,
शरारत युवकों की देख,
भैंस दौड़कर आई पास,
सिर पर उठा मारा फेंक।
दिखा रहा था, स्टंट वो,
ट्रैक्टर से वो नये करतब,
बैलेंस बिगड़ गया ट्रैक्टर,
उसके नीचे गया वो दब।
शरारत बुरा काम बताया,
कभी नहीं करना ये काम,
बिना खर्च, बिना मेहनत,
हो जाता है जन बदनाम।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
नवल किरण
विधा-कविता
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नवल किरण लालिमा लिये,
उदय हो रहा सूर्यदेव आज,
हर्षित, प्रसन्न कर देगा जग,
किसान चले हल सिर ताज।
नवल किरण ले आई जोश,
उठो दौड़ो नहीं रहो खामोश,
बहती हवा को लो आगोश,
निद्रा बुरी हो, रख लो होश।
नवल किरण लेकर आई है,
भातृ भाव बन एकता संचार,
तत्परता से यत्न कर लो अब
हो बंधुत्व और बढ़े वो प्यार।
नवल किरण लेकर आई है,
नई मन उमंग नई बन बहार,
आकाश को छूने की तमन्ना,
दिल में बसा हो इंसान प्यार।
नवल किरण धवल चंद्रमा,
नवोन्मेष नवभोर दिखा रही,
कभी न रुकने का दे पैगाम,
तन और मन का रुके नहीं।
सूर्य से सीख लो हित करना,
कभी न डरना कर्म ही करना,
जब तक मंजिल हाथ लगे ना,
तब तक सारे दुख जन हरना।





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