चुनरी /दोहा छंद
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चुनरी मां की लाज है,
कहता जन संसार।
चुनरी ओढ़े मां कभी,
बढ़े जगत में प्यार। 2।
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चुनरी औरत ओढ़ती,
लज्जा इसको मान।
चुनरी में सजकर चले,
शादी उत्सव जान। 4।
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नई नवेली नार जब,
चुनरी ओढ़े लाल।
शादी को इंगित करे,
हो मतवाली चाल। 6।
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औरत सजती है कभी,
चुनरी उसकी लाज।
बाबुल यादें मन बसे,
खूब छुपाती राज। 8।
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ओढ़ा चुनरी मात को,
बनते बिगड़े काम।
पाप हरेगी भक्त के,
स्वर्ग मिलेगा धाम। 10।
कन्या पूजन
विधा-कविता
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कन्या एक वरदान है,
कर लो इसकी पूजा,
सबसे बड़ा धर्म होता,
नहीं बड़ा काम दूजा।
कन्या का संसार बड़ा,
मन को सभी सुहाता,
वो घर स्वर्ग बनता है,
जब कन्या कदम पाता।
कन्या को, देखो अब,
गर्भ में रहे हैं जन मार,
कन्या पालते जो जन,
मिलता है प्यार अपार।
कन्या घर में शोभा है,
साक्षात देवी का रूप,
कन्या की पूजा करता,
वो लगता है जन भूप।
कन्या जग में धर्म है,
आओ करे सब पूजा,
पुण्य से तन भर जाये,
नहीं धर्म इससे दूजा।।
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अमृत****************
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घोल दिया था अमृत तूने,
जीवन में बड़ा निराश था,
जब तुम बन भार्या आई,
मिला खुशबू अहसास था।
दिनरात एक चाहत होती,
चैन नहीं मिल, पाया था,
जिस दिन मायके गई तुम,
अन्न पानी ना लुभाया था।
शकुन मिलता था तुझ से,
जब तुम पास आती मेरे,
मैं तुमको घेरे रखता था,
ज्यों भंवरा फूल को घेरे।
हंसते मिल खाना खाते थे,
कभी रोने की सोची नहीं,
पर ऐसी बदकिस्मत बने,
सोचा था नहीं होगी कहीं।
छोड़ गई मझधार में तुम,
किससे हम दिल लगाये,
दुख का पहाड़ टूटा पड़ा,
दुख के बादल घिर आये,
महज आठ वर्ष साथ रहे,
छीन ली प्रभु ने तुम हमसे,
किसको सुनाऊं व्यथा निज,
दिल भरा हुआ है गम से।।
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कविता/
पढ़ाई
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वाह वाह! क्या जमाना आया
आधुनिक पढ़ाई ने समझाया,
खाना पीना,हंसाना रोना गाना,
बस एक साथ ही मन लगाया।
कभी एकांत में पढ़ते थे छात्र,
मन लगाकर होता सब काम,
मेहनत के बल आगे बढ़ते थे,
होता था देश विदेश में नाम।
दिनरात एक कर देते थे सब,
अव्वल आते थे परीक्षा खूब,
मां बाप आशीर्वाद देते फिर,
पिलाते थे उन्हें घी और दूध।
बदल गया आज तो जमाना,
पढ़ रहे सुनते गाना संग संग,
मुंह से अपना खाना खा रहे,
टीवी देखते नहीं ध्यान भंग।
बालक हैं या बने कंप्यूटर,
क्या बुद्धि उन्होंने अब पाई,
बस पढ़ाई का तरीका देख,
सारी दुनिया बड़ी ही हर्षाई।





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