Thursday, October 22, 2020

 


नक्श- ए- पा    
विधा-दो दोहे
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मानव बनजा राम के,नक्श- ए- पा को देख।
तू  सीख  पाएगा  तभी , मर्यादा  के  लेख ।।

दिया विभीषण भेद तो  , राघव पाई जीत ।
बतलाओ हनुमान जी ,अनुचर है या मीत ।।
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नक्श-ए-वस
     दोहे
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मानव बनजा राम के,नक्श- ए- पा को देख।
तू  सीख  पाएगा  तभी , मर्यादा  के  लेख ।।

दिया विभीषण भेद तो  , राघव पाई जीत ।
बतलाओ हनुमान जी ,अनुचर है या मीत ।।
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   दोहे
मां चरणों में बैठकर, मिटे पाप संताप।
नक्श-ए-पा सदा चलो,माता हरती पाप।।

माता मेरी अर्ज है, सिर पर रखना हाथ।
पाप कर्म से दूर रख, हरदम देना साथ।।

मां कात्यायनी
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कात्यायन ऋषि के यहां, लिया जन्म मां रूप।
महिषासुर को मार कर, किये खुश देव भूप।।

मां का इस संसार में, सदा रहा है प्यार।
आशीर्वाद कभी मिले,कभी नहीं हो हार।।

देव खड़े संसार में, जोड़े दोनों हाथ।
मां के दर्शन चाहते, मात चाहते साथ।।



परिवार
विधा-कविता
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मिलता जहां का प्यार,
हर सदस्य का ऐतबार,
मुसीबत सहकर हजार,
बनता है सुंदर परिवार।

एकता की हो मिसाल,
पिता माता जाने हाल,
हुये विघटित परिवार,
लुप्त हैं संयुक्त परिवार।

कहीं भी जाये नाम हो,
मिलकर सब काम हो,
परिवार बनता धाम हो,
मिल बैठे जब शाम हो।

जगत की कहो इकाई,
महिमा दिल में बसाई,
ऐसा जग कमाये नाम,
कभी नहीं हो हंसाई।।

मिलती हरदम एकता,
तन से मिले अनेकता,
करते मिलजुल काम,
जगत में होता है नाम।

दूर दराज फैलती हो,
खुशबू जिस परिवार,
नाम कमाता है सदा,
साथ मिलेगा संसार।
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रावण मारीच संवाद
कविता
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हुई बुद्धि रावण भ्रष्ट,
पहुंचा मारीच पास,
बोला पास आ मेरे,
बात बड़ी ही खास।

सोने का मृग बनो,
सीता सम्मुख जा,
राम तेरे पीछे चले,
सीता को मैं लूं पा।

मारीच ने समझाया,
रावण आया तहस,
काट दूंगा सिर तेरा,
अगर करेगा बहस।

कहता हूं वैसा मान,
दूंगा तुमको उपहार,
नाम कर दूंगा  तेरा
मिले जहां का प्यार

आखिर मान गया वो,
बनकर सोने का हिरण,
रावण सीता हर लाया,
मौत को बुला लाया।।
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   कविता

महाषासुर था अभिमानी,
देव कर डाले थे परेशान,
देवों को तंग करना बनी,
महिषासुर  की पहचान।

कात्यायन ऋषि तपस्वी,
माता से की उन्हें पुकार,
उनकी पुत्री रूप में माता,
आई थी जग में ले प्यार।

महिषासुर को मार डाला,
देवता किये थे सभी खुश,
तीनों लोकों में प्यार फैला,
मिटाया पल में सारा दुख।

कात्यायन ऋषि के यहां,
जन्म लिया पली थी मां,
कात्यायनी वो कहलाई,
उनकी छवि मन बसाई।

सभी कष्ट दूर हो जाये,
जो रटते माता का नाम,
दुख दरिद्रता खत्म हो,
पल में पूर्ण सभी काम।
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    कविता

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सबरी की भक्ति सुफल,
पहुंचे चलकर श्री राम,
सीता की खोज कर रहे,
आये थे सबरी के धाम।

प्रसन्न हुई सबरी देखकर,
खिला डाले झूठे ही बेर,
चलते चलते श्रीराम कहा,
आयेंगे हम चलकर फेर।

सबरी की भक्ति सफल,
पहुंची प्रभु के ही धाम,
सदियों तक चलता रहे,
सबरी श्रीराम का नाम।

प्रेम में शक्ति अपार है,
भक्त-प्रभु का है मेल,
सदियों तक याद रहे,
दिखाये प्रभु ने खेल।।

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