उसकी आंखें
विधा-दोहा छंद
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सीमा पर वीर की आंखें दुश्मन को देखकर क्या
कह रही हैं----------
1.
उसकी आंखें ढूंढती, सीमा पर तैयार।
दुश्मन आये सामने, टुकड़े करे हजार। 2।
सजनी की आंखें क्या कहते हुए प्रतीत होती हैं.....
2.
उसकी आंखें देखकर, आया हमको प्यार।
गौरा मुखड़ा चांद सा, तन में भरा खुमार। 4।
प्रियतम अपनी प्रियतमा की आंखें देखकर क्या बयां कर रहा है...
3.
उसकी आंखें झील सी, हिरनी जैसी चाल।
देेखी कपोल लालिमा, हाल हुआ बेहाल। 6।
पवन/समीर/अनिल/वात/हवा..इत्यादि
विधा-कविता
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पवन चली सुहानी, मन हुआ विभारे,
भीनी भी खुशबू, भंवरे लगे चित्तचोर,
कभी हवा के वेग से, पत्ते गा रहे गीत,
ठंडी ठंडी हवा में, मन लगता है मीत।
समीर सुहानी भोर की, मन होता खुश,
प्रदूषित हवा कही, मन को होता दुख,
कभी कभी पवन वेग, करदे बुरा हाल,
लगता है मौसम ने, बदली अपनी चाल।
हवा किसी को लगे, बोलना करे बंद,
हवा बुरी जब आये, चाल चले मंद,
वात ऐसी हो जगत, मन हो जाए खुश,
दुख दर्द जहां मिटे, रहे नहीं कोई दुख।
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*स्वरचित, नितांत मौलिक
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अनुप्रास अलंकार का प्रयोग करते हुये काव्य सृजन
विधा-कविता
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मां मैया मांगती करो भरो बलिदान,
डर डरकर मतना डरो ये नही शान,
आज राज काज में कह रहे ये जन,
अब अपनी आत्म आत्मा पहचान।
खेल खेल में खेल गये, ऐसे इंसान,
जन्म जान जन्मांतर, किया उत्थान,
कहां कहां से कह रहे अब ले जान,
आज काज कर ले तब,बनेगी शान।।
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यादें
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डूबो गई दर्द आंसुओं में,
चली गई छोड़कर जहान,
जिस सोच को लेके आई,
पूरा ना किया तुमने काम।
जयंती मनाते बस तुम्हारी
यादें तुम्हारी सब बाकी हैं,
किसको सुनाये अपना गम,
ना पीते हम कभी शाकी है।
दस वर्ष बीत, गये बिछुड़े,
लगते हैं पहाड़ समान दिन,
बीत गये सुहाने जो दिन थे,
बीतेंगे बस दिन गिन-गिन।
ना मिलेंगे अब तुमसे अब,
पर जरूर एक दिन आएंगे,
सुनहरे सपने फिर पूरे होंगे,
बस उन यादों में खो जाएंगे।




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