कुछ देर में जब
विधा-कविता
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कुछ देर में जब, रावण होगा दहन,
बुराइयां जल जाएंगी, मन हर्षाएंगी,
अगले वर्ष फिर रावण,सब जलाएं,
रावण खत्म न हो,कोई तो बतलाए?
कुछ देर में जब, बम होता विस्फोट,
बे-मौत मर जाते, उनका क्या खोट,
कब तक आतंकवादी,यूं ही सताएंगे,
आतंकवाद को कब जन मिटा पाएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते हैं बलात्कार,
फिर गई एक औरत जिंदगी ही हार,
कब तब ये तमाशा देखते रह जाएंगे,
कोई बताए, बलात्कारी मिट पाएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते हुआ शहीद,
एक-एक कब तक शहीद हो जाएंगे,
बैर भाव सीमा पर बढ़ता जा रहा है,
इस बैर भाव को कैसे हम मिटाएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते हैं भ्रूण हत्या,
एक लिंग जांच गिरोह, और पकड़ा,
भ्रूण हत्या का पाप कैसे हम हटाएंगे,
देश के दरिंद्रों को कैसे हम मिटाएंगे?
कुछ देर में जब, औरत फांसी खाई,
आखिरकार ऐसी क्या नौबत है आई,
औरत अस्मिता को कैसे हम बचाएंगे,
अत्याचारियों को, कैसे मार गिराएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते एक समाचार,
एक औरत करवाती थी, देह व्यापार,
श्रीकृष्ण की भूमि ऐसा हो अत्याचार,
बताओ कैसे मिले नारी आदर सत्कार?
कुछ देर में जब, पकड़ते रिश्वतखोर,
श्रीराम की भूमि, ऐसा पाप करे घोर,
रिश्वत से कब उनके, पेट भर जाएंगे,
कब इनको भारत देश से मिटा पाएंगे?
कुछ देर में जब, कर डाली है हत्या,
वार कर दिया, वो था जब निहत्था,
बेटे ने बाप को ही मारा,समाज हारा,
हत्यारों से कैसे बुजुर्गों को बचाओगे?
कुछ देर में जब,सुनते ठगी का काम,
ठग लिया जन दाम, रगड़ो बस बाम,
चोर और ठग, कैसे पकड़ में आएंगे,
कोई जवाब दे,कैसे इन्हें मिटा पाएंगे?
कुछ देर में जब, आएगा बड़ा तूफान,
गिर जाएंगे मकान, खत्म हो जन शान,
कैसे जग के जन, सुरक्षित बच पाएंगे,
लाख प्रयास करो फिर कुछ मर जाएंगे?
कुछ देर में जब,जन की हो जाती मौत,
कहते सुना लोगों से, भरा था तन खोट,
सारी धन दौलत पड़ी, मुफ्त में खाएंगे,
बताए, कैसे इस मौत को मात दे पाएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते साधु व्याख्यान,
मौत अटल है सुन, जन बहुत हर्षाएंगे,
मान लेंगे उसे जाना था वो चला गया,
बताए, मन पर कैसे कोई काबू पाएंगे?
कुछ देर में जब, मन को यूं बहलाएंगे,
दुनिया जब तक रहेगी, बुराइयां रहेंगी,
बिछुड़े हुये का दर्द दुख फिर भुलाएंगे,
जिंदगी बीताकर जन,यूं ही चले जाएंगे।
कलियुग की विपत्तियां आएंगी वो घोर,
बढ़ते ही जाएंगे, भविष्य का नहीं छोर,
कुछ देर में जब, कहेंगे, जो हो होने दे,
काम सरकार का है,हमें नींद में सोने दे।।
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कुछ देर में जब
विधा-कविता
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कुछ देर में जब, रावण होगा दहन,
बुराइयां जल जाएंगी, मन हर्षाएंगी,
अगले वर्ष फिर रावण,जब जलाएं,
रावण खत्म न हो,कोई तो बतलाए।
कुछ देर में जब, बम होता विस्फोट,
बे-मौत मर जाते, उनका क्या खोट,
कब तग आतंकवादी, यूं ही सताएंगे,
आतंकवाद को कब तक जला पाएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते हैं बलात्कार,
फिर गई एक औरत जिंदगी ही हार,
कब तब ये तमाशा देखते रह जाएंगे,
कोई बताए, बलात्कारी मिट पाएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते हुआ शहीद,
एक एक कब तक शहीद हो जाएंगे,
बैर भाव सीमा पर बढ़ता जा रहा है,
इस बैर भाव को कैसे हम मिटाएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते हैं भ्रूण हत्या,
एक लिंग जांच गिरोह, और पकड़ा,
भ्रूण हत्या का पाप कैसे हम हटाएंगे,
देश के दरिंद्रों को कैसे हम मिटाएंगे?
कुछ देर में जब, औरत फांसी खाई,
आखिरकार ऐसी क्या नौबत है आई,
औरत अस्मिता को कैसे हम बचाएंगे,
अत्याचारियों को, कैसे मार गिराएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते एक समाचार,
एक औरत करवाती थी, देह व्यापार,
श्रीकृष्ण की भूमि ऐसा हो अत्याचार,
बताओ कैसे मिले नारी आदर सत्कार?
कुछ देर में जब, पकड़ते रिश्वतखोर,
श्रीराम की भूमि, ऐसा पाप करे घोर,
रिश्वत से कब उनके, पेट भर जाएंगे,
कब इनको भारत देश से मिटा पाएंगे?
कुछ देर में जब, कर डाली है हत्या,
वार कर दिया, वो था जब निहत्था,
बेटे ने बाप को ही मारा,समाज हारा,
हत्यारों से कैसे बुजुर्गों को बचाओगे?
कुछ देर में जब,सुनते ठगी का काम,
ठग लिया जन दाम, रगड़ो बग बाम,
चोर और ठग, कैसे पकड़ में लाएंगे,
कोई जवाब दे,कैसे इन्हें मिटा पाएंगे?
कुछ देर में जब, आएगा बड़ा तूफान,
गिर जाएंगे मकान, खत्म हो जन शान,
कैसे जग के जन, सुरक्षित बच पाएंगे,
लाख प्रयास करो फिर कुछ मर जाएंगे?
कुछ देर में जब,जन की हो जाती मौत,
कहते सुना लोगों से, भरा था तन खोट,
सारी धन दौलत पड़ी, मुफ्त में खाएंगे,
बताए, कैसे इस मौत को मात दे पाएंगे?
कुछ देर में जब, सुनते साधु व्याख्यान,
मौत अटल है सुन, जन बहुत हर्षाएंगे,
मान लेंगे उसे जाना था वो चला गया,
बताए, मन पर कैसे कोई काबू पाएंगे?
कुछ देर में जब, मन को यूं बहलाएंगे,
दुनिया जब तक रहेगी, बुराइयां रहेंगी,
बिछुड़े हुये का दर्द दुख फिर भुलाएंगे,
जिंदगी बीताकर जन,यूं ही चले जाएंगे।
कलियुग की विपत्तियां आएंगी वो घोर,
बढ़ते ही जाएंगे, भविष्य का नहीं छोर,
कुछ देर में जब, कहेंगे, जो हो होने दे,
काम सरकार का है,हमें नींद में सोने दे।।
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स्वरचित/नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
दुर्गा/जननी/अंबे/जगदंबे......इत्यादि
विधा-कविता
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मां दुर्गा को पूजते,
करती है बेड़ा पार,
सारे जगत का मां,
कहलाती आधार।
मां से बड़ा जग में,
देवी नहीं है कोई,
मां चाहे वो होती,
ना चाहे ना होय।
मेरी अर्ज सुन लो,
मां दुर्गा मां अंबे,
जीवन दुख मिटा,
मां देवी जगदंबे।
महागौरी कहाती,
जगत पालन हार,
तेरे दर्शन सदा हो,
जन्म मिले हजार।।
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पंखुड़ी
विधा-चोका
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फूल खिलता
मन तब हरता
सोच डरता
भंवरा भी मरता
चीज अजब
देती खुशबू जन
प्रसन्न मन
पंखुड़ी का जीवन
लगे सुहाना
चार दिन जीकर
वापस घर जाना।






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