रावण/लंकेश/दशानन/दशकंधर/केकसी सुत....इत्यादि
विधा-दोहे
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असली रावण मर चुका, नकली रावण शेष।
जला रहे हैं आज भी, ढूंढ रहे अवशेष।।
नारी का अपमान कर, हुआ दशानन अंत।
महिला का सम्मान कर, कहते जग के संत।।
देख लंकेश जल रहा, ज्ञान हुआ बेकाम।
नारी के अपमान से, मानव हो बदनाम।।
घूम रहे हैं आज भी, रावण जैसे लोग।
चरित्र से वो गिर चुके, पर नारी का भोग।।
रावण बनकर लूटते, नारी इज्जत मान।
समाज में ही घूमते, इनको लो पहचान।।
अपने आप से कहता हूं
विधा-कविता
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अपने आपसे कहता हूं , रावण अभी जिंदा मरा नहीं,
घूम रहा है गलियों में वो मिल जाये यहां वहां कहीं,
कितनी नारियों पर आज रावण कर रहे हैं अत्याचार,
दुर्भाग्य इस देश में राम नहीं रावण को मिलता प्यार,
एक दिन आयेगा जब ये रावण जग से मिट जाएंगे,
अपने मन से कहता हूं वो दिन अब जल्दही आएंगे।।
अपने आपसे कहता हूं , रावण अभी जिंदा मरा नहीं,
घूम रहा है गलियों में वो मिल जाये यहां वहां कहीं,
कितनी नारियों पर आज रावण कर रहे हैं अत्याचार,
दुर्भाग्य इस देश में राम नहीं रावण को मिलता प्यार,
एक दिन आयेगा जब ये रावण जग से मिट जाएंगे,
अपने मन से कहता हूं वो दिन अब जल्दही आएंगे।।
विधा----कविता
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सिद्धिदात्री
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नौ रूपों में पूजते,
मां दुर्गा है नाम,
हर जन खुश रहे,
सुबह और शाम।
नौवां सिद्धिदात्री,
करे मंगल भारी,
भक्तों की रक्षा हो,
कष्ट मिटेंगे सारी,
सरस्वती का रूप,
जन मन लुभाता,
मां की कृपा रहे,
दुख नहीं सताता।
कमल,गदा, शंख,
हाथ सुदर्शन रखे,
दुष्टों का अंत करे
दानव से ना डरे।
कन्या मां रूप है,
करो उनकी सेवा,
सभी कष्ट मिटते,
मिलेगी बड़ी मेवा।
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कविता / सबल नारी
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कहते जिसको नारी,
वो लगती है बेचारी,
दुख- दर्द जहां मिले,
कष्टों से वो न हारी।
ऊंचे पहाड़ चढऩा है,
या फिर दिनभर काम,
कहने को अबला हो,
पर पूरे जगत में नाम।
बच्चे को, वो पालती,
शरीर से बेशक क्षीण,
सुख दुख की है साथी,
रखे नहीं भावना हीन।
अपना पेट पालती वो,
भूखी प्यासी करे काम,
इसलिए तो नारी जगत,
अनमोल बड़ी है बेदाम।
कोमल शरीर, बेशक है,
भार उठाती है वो भारी,
लाख मुसीबत आ जाये,
संकट देख नहीं वो हारी।
आज नारी का जगत में,
सबसे ऊंचा जग में नाम,
अंगुली दांतो तले दबाते,
देख देख उसका काम।।





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