प्यार/प्रेम
विधा-दोहे
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पांडव बल था एकता, भाई भाई का प्यार।
काम सदा होते सफल,प्रेम धरा आधार।।
भाई भाई में प्यार हो, पले जब भ्रातृप्रेम।
बहुत बड़ी ताकत कहे, आपस का ये प्रेम।
कहे अहिंसा आज सुन, क्यों करते हो युद्ध।
आपस में जब प्रेम हो, जन भी लगते बुद्ध।।
बापू को जग मानता, जन्मदिन रहे याद।
मार्ग चलो प्यार के, करो नहीं फरियाद।।
प्यार देश में यदि बढ़े, मिटे जगत से बैर।
उसकी आंखों ने कहा, प्रभु रखते हैं खैर।
दोहे************************
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समय सदा ही दौड़ता, मिलता नहीं उधार।
मोल भाव होता नहीं, करो वक्त से प्यार।।
सर्दी गर्मी मौसम सभी, आते सदा न साथ।
कभी पसीना छूटता, कभी कांपते हाथ।।
स्वेटर पहनो जब कभी, सर्दी पड़ती खूब।
गर्मी सर्दी में नहीं, पनपती कभी दूब।।
मुफलिसी में भी मजा है
विधा-कविता
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गरीबी अमीरी संग चले,
राजा बन सकता फकीर,
कहते हैं यह प्रभु रजा है,
मुफलिसी में भी मजा है।
फकीर बन सकते अमीर,
बैठे बैठाये यमुना के तीर,
गरीबी कोई नहीं सजा है,
मुफलिसी में भी मजा है।
जगत में मुफलिस इंसान,
सच्चे इंसान की पहचान,
अमीरी लोगों का नशा है,
मुफलिसी में भी मजा है।
मुफलिस इंसान मिलते हैं,
जगत ईश्वर के बहुत पास,
धन दौलत को तरसते सदा,
दिल की बुराई करते नाश।
ईश्वर के सदा दिल में रहते,
गरीब, निर्मल,स्वच्छ इंसान,
अमीरों के दिल कठोर होते,
मिलते बस दौलत के दास।
तुलसीदास गंगा के तट पर,
मुफलिसी दिन रात बिताये,
उनकी सच्ची भक्ति देखकर,
खुद श्रीराम मिलने को आये।
मुफलिसी में नरसी भगत ने,
प्रभु भक्ति का छोड़ा न साथ,
श्रीकृष्ण भात भरने आये थे,
आया पकड़ा नरसी का हाथ।
मुफलिसी में दिन बिताये थे,
गरीब सुदामा करता विनती,
श्रीकृष्ण ने आकर घर भरा,
दौलत नहीं, हो पाई गिनती।
सबरी प्रभु भजन कर रही,
मुफलिसी में बिताती दिन,
ईश्वर श्रीराम, पहुंचे मिलने,
झूठे बेर खिलाये गिन गिन।
रैदास को कौन नहीं जानता,
मुफलिसी उनके काम आई,
गंगा में जब पैसा फेंका था,
सुन रैदास, गंगा हाथ बढ़ाई।
मन चंगा तो कटौती में गंगा,
गरीबी,भक्ति दोनों ही दर्शाता,
रैदास की गरीबी और भक्ति,
रह-रहकर मन को तरसाता।
नामदेव,कबीर और त्रिलोचन,
सधना, सैनु निम्र वर्ग कहलाए,
भक्तिभाव दिल में अति जागा,
ईश्वर के वो बहुत पास आए।
मुफलिस हो जन जन के प्रिय,
मलिन मन नहीं मिलता उनका,
पले में सोने का महल बन जाए,
फेंक दे प्रभु नाम से वो तिनका।
मुफलिसी होती बड़े काम की,
ले जायेगी प्रभु के बहुत पास,
जिनकी कृपा सदा बनी रहती,
पाप,बुराई का दिल से हो नाश।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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सपना
विधा-क्षणिकाएं
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1
सपने बिखर जाते हैं,
सपने सुहाने लगते हैं।
जब मन खुश होते हैं,
तो नये सपने सजते हैं।।
2
सपने पहाड़ कूदा दे,
सपने तो रंग जमा दे।
सपने का क्या कहना,
हँसते हुये को रुला दे।।




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