दाम/कीमत/मूल्य/मोल विधा-दोहे
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ख्याल करे वो रात दिन, खुल जाती है पोल।
जन की कीमत जान लेे, जीवन है अनमोल।।
जोर शोर से बोलते, रिश्वत में ले दाम।
पीते निर्धन खून ये, ओछे इनके काम।।
मौका कभी न चूकना, कीमत वक्त की जान।
युगों युगों से मानते, वक्त बड़ा बलवान।।
कीमत कुर्सी देख के, बैठे उस पर लोग।
इसका चक्कर जान ले, होता कुर्सी रोग।।
सुंदरता उपहार है, नहीं मोल की चीज।
खलिहानों में ढूंढते, बना नहीं है बीज।।
चूहा
विधा-कविता
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कृंतक प्राणी कहलाते हैं, कुतर जाते चीज हमारी,
कभी अन्न,पेड़ कुतरता, कभी कुतरे किताब हमारी,
अजीब प्राणी धरती का, कहती है दुनिया यह सारी,
गणेश का प्रिय वाहन, करते हैं बस इसकी सवारी।
बुद्धि, विद्या के दाता कहलाते, दुश्मनों का करे संहार,
मूषक भी फुर्तीला होता, वस्तुओं का करे काम तमाम,
क्यों करते गणेश चूहे की सवारी,दो कथाएं ये समझाएं,
कैसे चूहा वाहन बना गणेश का, आओ आज बतलाएं।
गजमुखासुर राक्षस ने कभी, देवों को, कर दिया परेशान,
देवता गणेश के पास पहुंचे, फिर राक्षस से युद्ध घमासान,
दांत टूट गया गणेश का, टूटे दांत से गणेश ने किया प्रहार,
राक्षस, चूहा बनकर डर से भागा,गणेश समक्ष मान ली हार।
गणेश ने पकड़ा राक्षस को, बना लिया अपना सुंदर वाहन,
दूसरी कथा बतलाती है, क्रौंच नामक गंधर्व था सभा देवाय ,
अप्सराओं से वो करता ठिठोली, इंद्र ने क्रोध में चूहा बनाय,
क्रोध में आया था तब इंद्र, क्रौंच को दिया मूषक ही बनाय।
मूषक पहुंचा पाराशर ऋषि के, अन्न, कपड़े दिये काट सारे,
वाटिका उजाड़ी, ग्रंथ कुतरे, परेशान कर डाले ऋषि हमारे,
शरण ली तब ऋषि ने गणेश की, फेंका गणेश ने निज पाश,
बेहोश हुआ मूषक गणेश पाश से, डाला उसे हाथी के पास।
जब होश में चूहा आया, पूजा करने लगा वो गणेश की,
स्तुति की गणेश ने उसकी, दे दिया मूषक एक वरदान,
मूषक ने अपनी इच्छा से, गणेश वाहन बनना लिया मान,
तब से मूषक ही गणेश जी का है, वाहन से हो पहचान।
बिल्ली मौसी से डरता है, उत्पाती जहान में मूषक निराला,
नहीं मानता किसी हाल में, प्लेग फैलाये, कर देता काला,
कुतर कुतर लाखों का करे नुकसान, ऐसा है मूषक हमारा,
शान की सवारी गणेश की, सुनो कहानी यह फर्ज हमारा।
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फैशन का भूत
कविता
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अजब गजब का फैशन आज,
फैशन करके करते दिल राज,
फैशन करने से ना आये बाज,
फैशन को समझते जैसे ताज।
लड़कियां फैशन में अब आगे,
कपड़े ऐसे जैसे बांधे तन धागे,
लड़कों के सिर देते आये दोष,
बस सुनकर होता है अफसोस।
फटी पुरानी रद्दी जो लगती हो,
वो महंगी, कहलाती बड़ी पेंट,
ऐसे मटक मटक कर चलते हैं,
जैसे चूल्हे पर गाड़ दिये हैं टैंट।
कपड़े औछे फाड़े हुये से लगते,
बात करो युवा झट से सुलगते,
कुत्ते देखकर, उनके लग जाते,
फिर भी फैशन में वो मर जाते।
लगे गरीबी सता रही है खूब,
कपड़े लगते जैसे उगी हो दूब,
लो कहते वाह फैशन है खूब,
निखार रहे अपना वो तो रूप।
भारत सभ्यता संस्कृति में आगे,
पश्चिमी की सभ्यता क्यों हावी,
हालात आज के दिन जब ऐसा,
कैसी आयेगी पीढ़ी कहाए भावी।।




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