Tuesday, September 22, 2020

 पूजा/आराधना
विधा-दोहे
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करते पूजा देव की, बनते बिगड़े काम।
मिले सफलता हर घड़ी, होगा जग में नाम।।

मात पिता आराधना, गुरु का कर सत्कार।
वाणी में हो मधुरता, मिले जहां का प्यार।।

पूजा की थाली रखो, ईश्वर के ही पास।
रोग दोष सब दूर हो, देगी भक्ति मिठास।।









-फिर कभी
विधा-कविता
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करना हो कर ले अभी,
सोच ना हो फिर कभी,
मन बना ले आज अभी,
सफल हो वो जन तभी।

रावण बड़ा विद्वान था,
पर उसे  अभिमान था,
सोच-सोच आज कल,
निकल गये समय-पल।

आगे से, धुआं मिटाना,
रावण दिल थी चाहत,
आलस्य से वो भरा था,
नहीं दिला पाया राहत।

आसमान को सीढ़ी भी,
रावण इच्छा थी लगाना,
आलस्य के घमंड में वो,
बीता दिया उसने जमना।

फिर कभी की चाहत हो,
वो नहीं सफलता पाएगा,
सुस्ती में जीवन जीए तो,
प्रभु भी नहीं बचा पाएगा।

आल अभी लो इसी वक्त,
रखता काम करने की चाह,
सफल हर काम हो उसका,
लोग कहेंगे वाह वाह वाह!

फिर कभी, दिल में बसता,
रोता वो, कभी नहीं हंसता,
उसे समय का नाग डसता,
उसके मन आलस्य बसता।

समय पर काम जो करता,
भाग्य उसका देता है साथ,
हर जगह नाम हो उसका,
वो कहलाता गुणी, उदात।

आज का काम आज करो,
कल का काम करना कल,
समय निकला हाथ न आए,
रहे समस्या नहीं मिले हल।

विद्वान जन चुस्त मिलते हैं,
मूर्ख व्यक्ति सुस्त मिलते हैं,
मेहनत वो जगत आंगन हो,
जहां खुशी फूल खिलते हैं।

फिर कभी वो विष बेल है,
फैलकर जग करती विनाश,
आज अभी वो अमृत होता,
विष का भी कर देता नाश।

फिर कभी जिस दिल बसे,
होता नहीं है, उसमें संचार
आज अभी जिस जन मिले,
प्रशंसक मिले उसके हजार।

आज अभी की वाणी गूंजे,
उस जन गाते गीत मल्हार,
आज अभी जिसका ओज,
वो हरदम काम को तैयार।

फिर कभी को मार भगाए,
जीवन अपना सफल बनाए,
आज अभी को आदर देकर,
अपने दिल में आज बसाएं।।

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