Friday, September 25, 2020

  लोकगीत
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जीवन में आता कभी, लगे नयापन काम।
खूब जहां में ढूंढ लो, हो जाएगी शाम।।

मानों जीवन है अभी, नयापन भरा जोश।
ठोकर लगती जब गिरे, आ जाता है होश।।

नया मानते हो जिसे, जीवन का वो अंग।
खुशियां जब झूमती, मन में भरती रंग।।

जीवन में हो जोश तब, नयापन लिये काम।
नहीं सफलता जब मिले, हो जाती है शाम।।






सागर मंथन
विधा-कविता
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दुर्वासा ऋषि का अपमान हुआ,
दे दिया इंद्र को लक्ष्मीहीन श्राप,
ब्रह्मा, विष्णु महेश मिलकर करे,
कैसे हो लक्ष्मी से इंद्रदेव मिलाप।

देवता दानव लड़े देव हुये क्षीण,
विष्णु नेे समझाई, देवों को बात,
मंथन लगातार चले दिन व रात,
वक्त है सोचो, करो दो दो हाथ।

दैत्यों को दिया लालच अमृत का,
हो गये दानव ,झटपट सभी खुश,
देवों ने वासुकी, नाग पूंछ पकड़ी,
दैत्यों का पकड़ा दिया नाग मुख।

कच्छप अवतार लिया विष्णु ने,
अपने पर टिकाया वो मंदराचल,
वासुकी नाग से शुरू मंथन समुद्र,
शिव समझे यूं होगी समस्या हल।

हलाहल सबसे पहले ही निकला,
भयभीत हुये सभी दानव और देव,
शिवभोले ने कंठ धारण कर लिया,
कहलाए वो नीलकंठ वाले ही देव।

फिर निकली थी कामधेनु जगत में,
करती है धरती पर वो ही उजाला,
उच्चै श्रवा निकला, तत्पश्चात घोड़ा,
इंद्र के पास रहा, लगाया मुंह ताला।

14 रत्नों में में फिर निकला ऐरावत,
इंद्रदेव ने पास रहा, यह एक खास,
कौस्तुभ मणि निकली मंथन के रास,
श्रीकृष्ण ने रख ली अपने ही पास।

पारिजात एक पौधा, सुंदर बहुत रंग,
देवों के पास रहा,बदला जीवन ढंग,
रंभा नामक अप्सरा सभा रही कुबेर,
मंथन तेजी से बढ़ा, हुई नहीं थी देर।

लक्ष्मी निकली मंथन,सुंदर और जवां,
विष्णु देव आगे बढ़े किया था विवाह,
वारुणि नामक निकली मंथन से शराब,
राक्षस पीकर मस्त हुये, हो गये खराब।

हुई फिर चंद्रमा उत्पत्ति, शोभा आकाश,
कल्पवृक्ष फिर आया, सुंदर होते है फूल,
देवताओं ने अपना लिया राक्षस गये भूल,
धीरे धीरे कमजोर राक्षस नष्ट हुये समूल।

फिर निकला पांचजन्य शंख सुंदर है रूप,
फिर आया धन्वंतरि, जिसकी थी तलाश,
धन तेरस का दिन, अमृत देखा जब हाथ,
अमृत पीने को दौड़े, दानव देव भूले साथ।

फिर आये विष्णु ले रूप मोहिनी अवतार,
देवों को पिलाया अमृत नैया कर दी पार,
राहु केतु राक्षसों ने, किया था अमृत पान,
विष्णु सुदर्शन काट दिये, राक्षस हुई हार।

आज भी जन राशि में राहु केतु है नाम,
नीच गृह कहलाते हैं, राक्षस के ही रूप,
इनका पूरा शरीर नहीं, कहाते हैं कुरूप,
विष्णु की महिमा को जानते गरीब भूप।

समुद्र मंथन से हुआ देवताओं का नाम,
सभी देवता अमृत पी बैठे थे निज धाम,
मानव देखो आज भी सोचता बुरी बात,
ऐसे में वो देव भी नहीं देते हैं जन साथ।।

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स्वरचित, नितांत मौलिक
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