Tuesday, September 15, 2020

जरा सुनो ............ 
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आत्मनिर्भरता और सरकार
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सरकार आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही है जो एकता द्वारा संभव है। रंतु आत्म निर्भर बनने में कई समस्याएं सामने आएंगी।
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 दोहा सुंदरता
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सुंदरता के सामने, फीके सारे रंग।
दानव मानव देवता, करे चित्त को भंग।।
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सुंदरता अनमोल है, मिलती नहीं सुगंध।
मन प्रसन्न हो देखकर, फिर आएगी गंध।।
 







दोहा

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सुंदरता उपहार है, जग कहता अनमोल।
खूब ढूंढ लो हाट पर, मिले कहीं ना मोल।।

सुंदरता को देखकर, भौचक्का इंसान।
अल्पावधि जो ठहरती, खूब जगत पहचान।।

सुंदरता उपहार है, नहीं मोल की चीज।
खलिहानों में ढूंढते,  बना नहीं है बीज।।

हिंदी में जब बात हो, मन मिलता संतोष।
जब भाषा अपमान हो, पलता जन में रोष।।
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हमसफर ना सही, हमदर्द बना लो
विधा-कविता
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मैं तो मुरली तुम्हारी हंू,यूँ होठों पर सजा लो,
सुंदर बहुत बजती हूं, हँस कर मुझे बजा लो,
मन से लगते हो शायर,कोई गीत गुनगुना लो,
हमसफर ना सही, मुझे निज हमदर्द बना लो।

सफर लंबा है जीवन का, बस साथ निभा लो,
दर्द मिलते हैं जीवन में, उन्हें हँसकर सजा लो,
साँस कब छोड़ दे तन को, कुछ सांसे बचा लो,
इसलिए हमसफर ना सही, हमदर्द ही बना लो।

जीवन में हमसफर भी, एक सहारा ही कहाता,
दुख भरे जीवन को, शकुन भरा रास्ता दिखाता,
कभी गिरने पर उठाकर, अपने दिल से लगाता,
तिमिर भर रास्ते का वो, एक दीपक कहलाता।

किस्मत भी देती है साथ, जो हिम्मत से चलता,
मेहनत का उसके सम्मुख ही,फूल एक खिलता,
जिसकी तमन्ना हो जितनी,वैसा फल भी मिलता,
शर्त यह है कि इंसान को,हमसफर एक मिलता।

मैं खुशबू हूं तुम्हारी, निज मन मंदिर में बसा लो,
मैं आंसू हूं तुम्हारी बस, अपने नयनों में समा लो,
याद आऊंगी तुमको सदा, निज यादें ही बना लो,
अच्छा होगा हमसफर ना सही, हमदर्द बना लो।


पायल बन सकती हूं तुम्हारी,पैरों में ही सजा लो,
मुुखड़ा हूं चांद सा एक,  अपने घूंघट में छुपा लो,
झुमकी समझ लो मुझको बस, कानों में लगा लो,
अच्छा होगा हमसफर ना सही, हमदर्द बना लो।

सात फेरे लिये हैं तेरे संग, अब घबराना है कैसा,
जीवन में बहुत जरूरी नहीं होता,धन दौलत पैसा
जो कर्म करता जाएगा जग में, फल मिलेगा वैसा
साथी जगत बनकर देखो,चकवा चकौर के जैसा

याद रखो हमसफर श्रीराम की बनी, संगी सीता,
अपने हमसफर के बल पर ही,रावण को जीता,
हो संगी साथी जगत यथार्थ, भक्त जैसे हो गीता,
हमसफर कहलाता है वहीं, ज्यों धरा संग फीता।

श्रीकृष्ण की हमसफर बनी, रुकमणि राधा प्यारी,
हर सुख दुख में साथ निभाया,बेशक युद्ध तैयारी,
कब साथ संगी छोड़ जाए तो,बनती व्यथा हमारी
हमसफर तो हमसफर होता, ना होता वो व्यापारी

रूठकर जो जा रहे हैं, उन्हें अब दौड़कर मना लो,
प्यार अपनों को दो इतना,उन्हें कदमों में झुका लो
पछताना पड़े जीवनभर,अच्छा हो सीने से लगा लो,
बेहतर होगा हमसफर नहीं सही, हमदर्द बना लो।        

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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
 व्हाट्सअप एवं फोन 09416348400
मेल आई डी-



कविता
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लुभा रहा स्वर संगम,
आओ मिल गाये गीत,
देश मेरा आगे ही बढ़े,
जन में बढ़ जाए प्रीत।

रामू कविता पढ़ रहा,
हँसा हँसा किया लोट,
कोई रागिनी गा रहा,
कोई निकालता खोट।

बेहतर प्रतिभागी आए,
हुआ जोर  का धमाल,
राजू की कविता प्यारी,
कर दिखलाया कमाल।

जीत हुई तब राजू की,
बड़ी मिल, गई ईनाम,
हिप हिप हुर्रे पुकारते,
दूर दराज हो गया नाम।

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