दोहा ****************
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शर्म युवा अब खो गई, ओछे करते काम।
नहीं किसी की मानते, मां बाप बदनाम।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
जरा सुनो
विषय-बढ़ते अपराध और पुलिस की भूमिका
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अपराधों को देख रही पुलिस खड़ी तमाशा।
और बढ़ेंगे अपराध, सुन सुन होती निराशा।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महंद्रगढ़,हरियाणा
शर्म लाज बालक नहीं, ओछे करते काम।
नहीं किसी की मानते, मां बाप बदनाम।।
दोहा***********************
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तिरस्कार उर में पले, फिर करते उपहास।
पीडि़त जन जाये कहां, रहते सदा उदास।।
पीकर केवल छाछ ही, करे खेत में काम।
खाना तक वो भूलते, पड़ा है कृषक नाम ।।
तिरस्कार हो नार का, करे दीन उपहास।
साधु संत को दर्द दे, पापी है वो खास।।
तिरस्कार विष बेल है, करती बड़ा विनाश।
सीता के अपमान सेे, लंका रावण नाश।
कहां गये वो वीर अब, पल में दे बलिदान।
जिनके बल पर देश की, बढ़ जाती है शान।।
भूल
विधा-कविता
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लंबा जीवन जन का, हो जाती है भूल,
पल-पल वो तड़पाती,चुभती जैसे शूल।
कभी कभी वो भूल ही, कर देती नाश,
एक भूल के कारण ही,जन बनता दास।।
खेल रहे बच्चे मिलकर, जोहड़ के पास,
गर्मी के दिन बहुत थे,गर्मी से थे संत्रास।
नहाने लगे जोहड़ में, डूब गये वो बेचारे,
एक भूल के कारण ही,हो गया सर्वनाश।।
युद्ध चला दो महारथी, करें वार पर वार,
दोनों तरफ हा-हाकार, माने नहीं वो हार।
एक दंभ में आकर के, घुसा युद्ध के बीच,
बस सैनिक टूट पड़े, वो दिया मिलके मार।।
बहुत समझाया बेटे को, हेलमेट लो पहन,
बेटा घमंड में चूर था, बात न करता सहन।
एक दिन सड़क पर, लगा दिखाने जवानी,
हुई ट्रक से टक्कर तो, खत्म हो गई कहानी।।
बीमार हुआ एक दिन, घर में बैठा जवान,
कहने पर दवा न लेता, समझे अपनी शान,
भूल ऐसी कर डाली, बढ़ता गया एक रोग,
ठीक नहीं हुआ कहीं पर, मौत में गई जान।।
भूल ना करो कभी भी, त्वरित करलो काम,
सोच समझकर काम करे, बच सकती जान,
जो भूलकर भूल न करे, वो जन होता महान,
अच्छी सोच बना लो, बनेगी जगत पहचान।।
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विषय- बारिश वाले बादल
विधा-काव्य
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बारिश वाले बादल, कह रहे एक बात,
दुनियां उसको मानती,धन जिसके साथ।
पानी जब तक बरसाता,मुझसे लेते काम,
खाली जब हो जाता,भूल जाते सब नाम।
निर्धन को जगत में, कोई नहीं चाहता है,
वो बेचारा जगत में, घिसकर मर जाता है।
जब जल मुझमें भरा, लोग खूब बुलाएंगे,
जल रहित होने पर ,जन देखकर हर्षायेंगे।
स्वार्थी जगत है सारा,स्वार्थ भरा जग प्यार,
निकला स्वार्थ जन का, पल में दे धुत्कार।
स्वार्थी इन लोगों से, बच- बचकर तू चल,
वरना दिन दूर नहीं, होना पड़े तुझे विहल।।
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शर्म युवा अब खो गई, ओछे करते काम।
नहीं किसी की मानते, मां बाप बदनाम।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
जरा सुनो
विषय-बढ़ते अपराध और पुलिस की भूमिका
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अपराधों को देख रही पुलिस खड़ी तमाशा।
और बढ़ेंगे अपराध, सुन सुन होती निराशा।।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महंद्रगढ़,हरियाणा
शर्म लाज बालक नहीं, ओछे करते काम।
नहीं किसी की मानते, मां बाप बदनाम।।
दोहा***********************
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तिरस्कार उर में पले, फिर करते उपहास।
पीडि़त जन जाये कहां, रहते सदा उदास।।
पीकर केवल छाछ ही, करे खेत में काम।
खाना तक वो भूलते, पड़ा है कृषक नाम ।।
तिरस्कार हो नार का, करे दीन उपहास।
साधु संत को दर्द दे, पापी है वो खास।।
तिरस्कार विष बेल है, करती बड़ा विनाश।
सीता के अपमान सेे, लंका रावण नाश।
कहां गये वो वीर अब, पल में दे बलिदान।
जिनके बल पर देश की, बढ़ जाती है शान।।
भूल
विधा-कविता
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लंबा जीवन जन का, हो जाती है भूल,
पल-पल वो तड़पाती,चुभती जैसे शूल।
कभी कभी वो भूल ही, कर देती नाश,
एक भूल के कारण ही,जन बनता दास।।
खेल रहे बच्चे मिलकर, जोहड़ के पास,
गर्मी के दिन बहुत थे,गर्मी से थे संत्रास।
नहाने लगे जोहड़ में, डूब गये वो बेचारे,
एक भूल के कारण ही,हो गया सर्वनाश।।
युद्ध चला दो महारथी, करें वार पर वार,
दोनों तरफ हा-हाकार, माने नहीं वो हार।
एक दंभ में आकर के, घुसा युद्ध के बीच,
बस सैनिक टूट पड़े, वो दिया मिलके मार।।
बहुत समझाया बेटे को, हेलमेट लो पहन,
बेटा घमंड में चूर था, बात न करता सहन।
एक दिन सड़क पर, लगा दिखाने जवानी,
हुई ट्रक से टक्कर तो, खत्म हो गई कहानी।।
बीमार हुआ एक दिन, घर में बैठा जवान,
कहने पर दवा न लेता, समझे अपनी शान,
भूल ऐसी कर डाली, बढ़ता गया एक रोग,
ठीक नहीं हुआ कहीं पर, मौत में गई जान।।
भूल ना करो कभी भी, त्वरित करलो काम,
सोच समझकर काम करे, बच सकती जान,
जो भूलकर भूल न करे, वो जन होता महान,
अच्छी सोच बना लो, बनेगी जगत पहचान।।
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विषय- बारिश वाले बादल
विधा-काव्य
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बारिश वाले बादल, कह रहे एक बात,
दुनियां उसको मानती,धन जिसके साथ।
पानी जब तक बरसाता,मुझसे लेते काम,
खाली जब हो जाता,भूल जाते सब नाम।
निर्धन को जगत में, कोई नहीं चाहता है,
वो बेचारा जगत में, घिसकर मर जाता है।
जब जल मुझमें भरा, लोग खूब बुलाएंगे,
जल रहित होने पर ,जन देखकर हर्षायेंगे।
स्वार्थी जगत है सारा,स्वार्थ भरा जग प्यार,
निकला स्वार्थ जन का, पल में दे धुत्कार।
स्वार्थी इन लोगों से, बच- बचकर तू चल,
वरना दिन दूर नहीं, होना पड़े तुझे विहल।।



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