जरा सुनो
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विषय-सरकारी विभागों में ठेकेदारी प्रथा कितनी उचित या अनुचित
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गरीबों का पैसा हड़पने में ठेकेदारों का अहं रोल हैं वहीं ठेके पर रखे कर्मियों का वे शोषण करने में अग्रणी होते हैं। ऐसे में ठेका प्रथा एक कलंक है।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
कुंडली
हेरा फेरी चल रही, डूबा पूर्ण समाज।
किसको दोषी अब कहे, सिर सजता है ताज।।
सिर सजता है ताज, समाज बहुत घबराता,
कहीं शिकायत होय, अंदर का मन डराता।।
होगा समाज खत्म, हो जाए अगर देरी,
देश गर्त में जाय, खत्म ना हेरा फेरी
हेरा फेरी चल रही, डूबा पूर्ण समाज।
किसको दोषी अब कहे, सिर सजता है ताज।।
अभिमान/दर्प/अहंकार
विधा-कुंडलियां
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तेरे वश कुछ भी नहीं , करता है भगवान ।
शेखी रहे बघारता , कर झूठा अभिमान ।
कर झूठा अभिमान,जोर अपना दिखलाता ।
हों सौ खड़े विकार , गिरादें अगर विधाता ।
छुटते महल मकान , लगें जंगल में डेरे ।
वह करता बदलाव , हाथ कुछ भी ना तेरे ।।
चित्रलेखन
विधा-कविता
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प्यार मुहब्बत बड़ी चीज है,
करता है जीव जगत संसार,
इंसानों में बेशक प्यार नहीं,
पशु पक्षियों में गहरा प्यार।
इंसानों भी शिक्षा लेते देखे,
जीवों का जब देखते हैं प्रेम,
इंसान तो बेशक निष्ठुर रहे,
पशु पक्षी पूछते कुशल क्षेम।
देख रहे इंसानों को जग में,
आपस में करे लड़ाई झगड़ा,
पशु से भी गिरे हुये लगते हैं,
सुनकर लगता झटका तगड़ा।
बुद्धिमान कहलाता खुद को,
पर बुद्धि का कहीं नाम नहीं,
हथियारों से, जमकर लड़ता,
लड़ पड़ता मौका मिले कहीं।
लो शिक्षा इन जीवों से अब,
कभी ना आपस में लडऩा है,
प्रेम, मुहब्बत,प्यार पले जहां,
उस वातावरण में ही पलना है।।
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नितांत मौलिक,स्वरचित
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संस्कार
विधा-गीत
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मिटे संस्कार युवा के,
पश्चिम का चढ़ा रंग।
कैसा होगा भविष्य अब,
पड़ी कुएं में भंग।।
मिटे संस्कार ..............
मां बाप की सेवा करे,
मिलता आशीर्वाद,
आना जाना लगा रहे,
रखेगी दुनिया याद,
देख देखकर युवा पीढ़ी,
मन आ चुका तंग,
मिटे संस्कार..........।
बड़े जनो के आदर से,
मिले उन्हें सहारा,
बुजुर्ग आज रो रहे,
दुर्भाग्य यह हमारा,
किसे कहे अब दोषी,
किससे छेड़े अब जंग,
मिटे संस्कार............।
जमकर गाली दे रहे,
नहीं निभाते यारी,
शराब,भांग, जुआ खेले,
यह सभ्यता न्यारी,
बुरे संस्कार हटाने होंगे,
छेड़ दो जंग,
मिटे संस्कार...........
मिटे संस्कार युवा के,
पश्चिम का चढ़ा रंग।
कैसा होगा भविष्य अब,
पड़ी कुएं में भंग।।
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नितांत मौलिक,स्वरचित
युग का आदमी
विधा-कविता
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अधरों पर मुस्कान भरी थी,
दिल में भरे होते थे अरमान,
परस्पर साथ निभाते थे सदा,
यही होती थी जन पहचान।
जान को जोखिम में डालते,
पर आंच नहीं, आने देते थे,
बड़ा कष्ट कोई आन पड़े तो,
अपने सिर पर वो ले लेते थे।
धर्म कर्म में लीन रहते थे वो,
मां बहनों की होती थी इज्जत,
हाथ बटाते थे, सभी मिलकर,
सेवा करते मिल नहीं हो दुर्गत।
युग पुरुष की तलाश है अब,
जो फिर रामराज में पहुुंचा दे,
हजारों कष्ट सिर पर झेल ले,
बस जगत को सुख खूब दे।।




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