अनकही बातें
विधा-मुक्तक
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1.मात्राभार-22
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अनकही बातें कभी, कर दे मन उदास।
अनकही बातें सुन, मन की बढ़ती प्यास।।
मन की बात सदा कहो, मन को रखो खुश,
अनकही बातें जन को, आती ना रास।।
2.मात्राभार-19
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अनकही बातें, कही नहीं जाये।
अनकही बातें कभी न हँसाये।।
मन की बातें मन में नहीं रखना,
अनकही बातें, जनों को सताये।।
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रंग
विधा-दोहे
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रंग बिरंगे फूल हो, भर दे मन में जोश।
बसंत बहार जब खिले, लेती जन आगोश।।
प्रेम प्रीत जग में बढ़े, बदले जन का रंग।
कदम कदम जब पाप हो, मानव मिलता तंग।।
काला ऐसा रंग है, नहीं चढ़ेगा और।
देख देख तन सांवला, नाचे मन का मोर।।
निर्बल/कमजोर
विधा-कविता
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कहते निर्बल गरीब को,
उसका नहीं हो सहारा,
मूर्ख जन कैसे भूला है,
प्रभु उसका मिले प्यारा।
निर्बल कभी नहीं मानिये,
निर्बल कोई नहीं मिलता,
निर्बल बेल पेड़ चढ़ जाए,
फूल उसी पर है खिलता।
निर्बल जन कोई नहीं हो,
मन हो सकता, है निर्बल,
कभी क्रोध में आ जाए तो,
निर्बल दिखाता निज बल।
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अंतर्मन को दीप्त करे
विधा-गीत
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अंतर्मन को दीप्त करे, फैला दो प्रकाश।
मन भंवरा सा नृत्य करे, जागे तब आश।।
अंतर्मन से...............................।
परहित में जीना पड़े, हो जा जगत उद्धार,
बढ़े देश में प्रीत जब, फैले जगत में प्यार,
बुराई जग में बढ़ रही, कर दो उनका नाश,
हिम्मत से सदा काम ले, बन कभी नहीं दास,
अंतर्मन को दीप्त करे......................।
भूल कोई कभी हो, मांग लेना फिर माफी,
दीन को कष्ट मिले, होगी वो नाइंसाफी,
आओ मिलकर गाये गीत, आये स्वतंत्र सांस,
कोई दुख दर्द में, मिले निज कोई भी पास,
अंतर्मन को दीप्त..............................।
भूखा कोई ना रहे, मन हो जाए खुश,
भूख गरीबी सताएगी, होगा मन को दुख,
सब धर्मांे का प्रचार हो, आये मन को रास,
खुशी में जीये सभी, कोई नहीं हो उदास,
अंतर्मन को दीप्त..............................।
अंतर्मन को दीप्त करे, फैला दो प्रकाश।
मन भंवरा सा नृत्य करे, जागे तब आश।।
अंतर्मन से...............................।
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विधा-मुक्तक
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1.मात्राभार-22
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अनकही बातें कभी, कर दे मन उदास।
अनकही बातें सुन, मन की बढ़ती प्यास।।
मन की बात सदा कहो, मन को रखो खुश,
अनकही बातें जन को, आती ना रास।।
2.मात्राभार-19
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अनकही बातें, कही नहीं जाये।
अनकही बातें कभी न हँसाये।।
मन की बातें मन में नहीं रखना,
अनकही बातें, जनों को सताये।।
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रंग
विधा-दोहे
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रंग बिरंगे फूल हो, भर दे मन में जोश।
बसंत बहार जब खिले, लेती जन आगोश।।
प्रेम प्रीत जग में बढ़े, बदले जन का रंग।
कदम कदम जब पाप हो, मानव मिलता तंग।।
काला ऐसा रंग है, नहीं चढ़ेगा और।
देख देख तन सांवला, नाचे मन का मोर।।
निर्बल/कमजोर
विधा-कविता
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कहते निर्बल गरीब को,
उसका नहीं हो सहारा,
मूर्ख जन कैसे भूला है,
प्रभु उसका मिले प्यारा।
निर्बल कभी नहीं मानिये,
निर्बल कोई नहीं मिलता,
निर्बल बेल पेड़ चढ़ जाए,
फूल उसी पर है खिलता।
निर्बल जन कोई नहीं हो,
मन हो सकता, है निर्बल,
कभी क्रोध में आ जाए तो,
निर्बल दिखाता निज बल।
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अंतर्मन को दीप्त करे
विधा-गीत
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अंतर्मन को दीप्त करे, फैला दो प्रकाश।
मन भंवरा सा नृत्य करे, जागे तब आश।।
अंतर्मन से...............................।
परहित में जीना पड़े, हो जा जगत उद्धार,
बढ़े देश में प्रीत जब, फैले जगत में प्यार,
बुराई जग में बढ़ रही, कर दो उनका नाश,
हिम्मत से सदा काम ले, बन कभी नहीं दास,
अंतर्मन को दीप्त करे......................।
भूल कोई कभी हो, मांग लेना फिर माफी,
दीन को कष्ट मिले, होगी वो नाइंसाफी,
आओ मिलकर गाये गीत, आये स्वतंत्र सांस,
कोई दुख दर्द में, मिले निज कोई भी पास,
अंतर्मन को दीप्त..............................।
भूखा कोई ना रहे, मन हो जाए खुश,
भूख गरीबी सताएगी, होगा मन को दुख,
सब धर्मांे का प्रचार हो, आये मन को रास,
खुशी में जीये सभी, कोई नहीं हो उदास,
अंतर्मन को दीप्त..............................।
अंतर्मन को दीप्त करे, फैला दो प्रकाश।
मन भंवरा सा नृत्य करे, जागे तब आश।।
अंतर्मन से...............................।
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