दोहा ***********************
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मर्यादित रहकर वटुक, सीखे गुरु से ज्ञान।
शीश झुकाते शान से, तनिक नहीं अभिमान।।
नहीं ज्ञान अभिमान हो, नहीं दान का गान।
करो प्रशंसा खुद कभी, घट जाएगा मान।।
मात पिता आराधना, गुरु का कर सत्कार।
वाणी में हो मधुरता, मिले जहां का प्यार।।
मोबाइल
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दिन रात तुम्हारा नाम रटता,
नहीं कोई भी समय बचता,
दिन रात बस ख्याल आता,
मोबाइल मुझे खूब सुहाता।
एक पल भी ना दूर करता,
बीवी परवाह न बच्चों की,
रोटी, पानी सभी भूल जाता,
सुध बुध भुलाए अच्छों की।
आंखें तुझे कुर्बान कर दूंगा,
रोग बेशक हजार लग जाए,
शिक्षा दीक्षा सब तुम ही हो,
प्रिय मोबाइल पास में आए।
कई बार गड्ढों में गिर पड़ता,
दुर्घटनाएं होते -होते बचती,
क्या चीज बनाई मोबाइल,
हर दिल में तेरी याद बसती।
आ गई दो बुरी बीमारी
दवा से नहीं होगी ठीक
नहीं सुधरेंगे लोग कभी
देते रहो चाहे कोई सीख,
सेल्फी की आई बीमारी
झटपट अपलोड करते है
मोबाइल पर ध्यान करते
बेशक पड़ते और गिरते हैं,
बेशक जान जा रही होती
झटपट विडियो बनाते जन
अपलोड करे विडियो को
खुश कर लेते अपना मन,
21वीं सदी की दोनो बुराई
समाज में कलंक बन चुकी
देश धर्म को नष्ट कर देती
सभ्य इंसान हुआ बड़ा दुखी।
मोबाइल
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घट गई अब दूरियां
यंत्र पर यंत्र आए हैं
एक दूजे से हैं स्मार्ट
जन को ये लुभाए हैं,
बैलगाड़ी से वायुयान
बढ़ी इंसान की शान
अब आए स्मार्टफोन
बने चुके जन के प्राण,
भोर से शाम तक बात
लिए हुए अपने हाथ,
रहता जन जन के पास
बीत जाती सारी रात,
क्या फोन जग में आए
इंसान का सुख छीना
प्राणों से प्यारा होता है
रीना हो या हो मीना।
फोन, फोन, फोन, फोन
कर दिए कई जन मौन
खाना सारा भूल जाएंगे
जब नहीं हो फोन टोन,
खाना बेशक नहीं मिले
बस मोबाइल एक मिले
सारे गम पल में गायब
उसके तो बाछे से खिले,
आंखें खो दी कान बहरे
हो रही कितनी दुर्घटनाएं
कितना नुकसान बता दे
सेल को छाती से लगाए,
विज्ञान बड़ी उपलब्धि
पर बनी है अभिशाप
हर चीज का पैमाना है
फोन करने का न माप।
मोबाइल का जमाना है
बस ताना बाना बुनता
कानों में वो लीड लगा
बस भोंडे गाने सुनता,
एक परिवार पांच जने
सारे ही खोए मस्ती मेंं
व्हाटस अप में लीन हैं
आग लगे इस बस्ती में,
लीड लगा गली में चले
हार्न पर हार्न बजाए जा
व्यर्थ की बातें देख सुन
समय बर्बाद कराए जा,
बड़े काम की खातिर है
सेल का होता दुरुपयोग
आपसी भाईचारा भूले,
परिवार में घटा संजोग।
मोहभंग हुआ पुस्तक से
बच्चे मोबाइल चलाते हैं
सादा खाना भूल गए हैं
अब सुरा मांस चाहते हैं,
हिंदी में वो बात करें ना
अंग्रेजी गीत गुनगुनाते हैं
पानी की जगह ठंडा पी
कानों में लीड लगाते हैं।
** होशियार सिंह लेखक,कनीना, हरियाणा**
स्नेह/प्रेम
विधा-कविता
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जिस दिल में प्यार बसे,
वो दिल मंदिर कहलाए,
जिस घर द्वार पाप बसे,
वो नरक द्वार कहलाए।
गरीब अमीर हर दिल,
प्यार सदा ही बसता है,
जिस दिल में घृणा हो,
वो नागिन सा डसता है।
स्नेह आपसी बंधन हो,
जीवों में भी मिलता है,
देख देख बच्चों का प्रेम,
मन फूल सा खिलता है।
प्रेम कोई नहीं हाट मिले,
हर दिल में यह बसता है,
प्रेम जहां से निराला होता,
प्रेम इस जहां में सस्ता है।
प्रेम कहानी रहती अमर,
पर प्रेम का कठिन डगर,
प्रेम बड़ा अनमोल होता,
प्रेम का सुंदर होता सफर।
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जीवन संघर्ष
विधा-कविता
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जीवन एक संघर्ष कहानी,
चलती नहीं इसमें मनमानी,
कभी दुख, बुढ़ापा दे जाता,
कभी अल्हड़ आती जवानी।
कभी ऊंची पढ़ाई करते हम,
कभी फीस की है मारामारी,
कभी बचपन में बीमार होते,
कभी मां रोती खड़ी बेचारी।
कभी बेरोजगारी की लाइन,
कभी शादी की होती तैयारी,
कभी अपनों की बेरुखी हो,
कभी बच्चों, की मूर्त प्यारी।
संघर्ष की भट्टी में, तपना हो,
तब मिलती है मंजिल अपनी,
हारकर जो बैठ जाएगा कभी,
जीत कभी ना उसको मिलनी।
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*स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन -09416348400
नमन कलम बोलती है साहित्य समूह
विषय क्रमांक -206
23 सितंबर 2020
विषय-वो लम्हें
विधा-कविता
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याद आते हैं वो लम्हें,
नदी किनारे मिलते थे,
गमों को भूल जाते थे,
मन के फूल खिलते थे।
याद आते हैं वो लम्हें,
विवाह बंधन में बंधे,
बोल नहीं पाये उनसे,
सबके गले देख रुंधे।
याद आते हैं वो लम्हें,
जब हम छोटे बच्चे थे,
झूठ कभी नहीं बोलते,
मन के कितने सच्चे थे।
याद आते हैं वो लम्हें,
कभी हम स्कूल जाते
खेल खेल में हंसते थे,
हर दिल में बसते थे।।
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*स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा
फोन -09416348400







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