इज्जत और इजाजत
विधा-कविता
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इज्जत और इजाजत
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इज्जत सबकी राखियो,
कह रहे विद्वान कबीर,
इज्जत उन्हें मिले सदा,
पल में हरते जन पीर।
इज्जत सं जीना सीखो,
इज्जत जग में प्यारी है,
इज्जत गहना,कंगन हो,
इज्जत राज दुलारी है।
इज्जत सबकी होती है,
इज्जत का ख्याल कर,
बेइज्जती जब कोई हो,
नहीं कोई सवाल कर।
छोटा बड़ा जग में नहीं,
उम्र ही बस प्रमाण हो,
कोई भी सामने आता,
इज्जत और सम्मान दो।
इज्जत का फल इज्जत,
बुरा बोल मिलेगा बुरा,
अमृत का फल अमृत,
डरकर रहता दर्द भरा।
इज्जत के नहीं पेड़ हो,
इज्जत मिले निज हाथ,
इज्जत अगर करते रहो,
इज्जत मिले, देगी साथ।
अपनी इज्जत प्यारी है,
पर इज्जत का ध्यान दो,
कड़वा बोल, ना बोलो,
बेशक ही बलिदान दो।
वृद्ध की इज्जत करते हो,
नाम कमाओगे जगत में,
बुरे कर्म का फल बुरा है,
पता लग जाये आफत में।
इज्जत के बल इस जगत,
पाते रहते सभी जन नाम,
जिसकी इज्जत घर में ना,
वो हो जाए जगत बदनाम।
विष्णु भगवान सो रहे थे,
भृगु पहुंचे उनके ही द्वार,
जाकर प्रभु को लात जड़े,
समझी फिर भी निज शान।
विष्णु ने उन्हें माफ किया,
पूछा तब भृगु हाल चाल,
इज्जत भृगु नहीं की विष्णु
सुदामा जीवन रहा बेहाल।
हनुमत इज्जत की प्रभु की,
सदा रहे उनके दिल वास,
ताकत और बल बुद्धि से,
किया हनुमत दुष्टों का नाश।
सबरी ने झूठे बेर खिलाये,
रखकर मन में इज्जत भाव,
खेवट की इज्जत रखी प्रभु,
धोय पैर पीया चढ़ाये नांव।
इज्जत केकैई, कौशल्या की,
प्रभु श्रीराम ने रखी हरदम,
रजा दशरथ की इज्जत रख,
वनवास किया पिता के दम।
इज्जत और इजाजत दोनों,
अलग अलग कहाते नाम,
इज्जत को ना इजाजत हो,
उसका अपना होता काम।
इजाजत लेकर बड़े जन,
करना हरदम कोई काम,
बुजुर्ग दिलों में बसते रहे,
वो बनते दिल सुंदर धाम।
इजाजत सभा में लेकर ही,
बोलो सदा सभा अनुकूल,
इजाजत जगत में काम हो,
इजाजत लेना कभी न भूल।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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नई शिक्षा नीति
विधा-गीत
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गीत
***********************14
नई शिक्षा नीति आई,
बच्चों के मन को भाई,
थैला नहीं उठाएंगे,
शिक्षा स्कूल में पाएंगे।।
अ,आ,इ,ई हम सीखेंगे,
नहीं किसी पर झीखेंगे,
जो भी छात्र मिल जाए,
उसको ज्ञान सिखाएंगे,
थैैला नहीं...........
अब शिक्षा भी बोझ नहीं,
देशों में जा पढ़ो कही,
डिग्री लेकर ही आयेंगे,
जग को हम दिखलाएंगे,
थैला नहीं...............
खेल खेल में पढ़ लेंगे,
खूब ज्ञान हम पाएंगे,
भारत के देशभक्त बन,
जन जन साथ निभाएंगे,
थैला नहीं..............
नई शिक्षा नीति आई,
बच्चों के मन को भाई,
थैला नहीं उठाएंगे,
शिक्षा स्कूल में पाएंगे।।
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विषय-पितृ पक्ष
विधा-कविता
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आ गये हैं श्राद्ध दिन,
पितरों का करो तर्पण,
खुश कर लो देवों को,
मतना देखो अब दर्पण।
एक वर्ष में आते जब,
तन मन कर दो अर्पण,
खीर चूरमा अर्पित कर,
पूरा होगा तभी तर्पण।
पितृदेवों को रखो खुश,
हो जाएंगे बिगड़े काम,
वृद्ध जनों की सेवा ही,
बराबर हो यात्रा धाम।
पितृ पक्ष बड़ा निराला,
जीवों को मिले निवाला,
गाय, ब्राह्मण होते खुश,
पितरों को मत दो दुख।
हर पितृ को याद करो ,
यही कहलाए पितृपक्ष,
सुबह सवेरे खाना देकर,
फिर दाना पानी ले भक्ष।
विधा-कविता
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इज्जत और इजाजत
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इज्जत सबकी राखियो,
कह रहे विद्वान कबीर,
इज्जत उन्हें मिले सदा,
पल में हरते जन पीर।
इज्जत सं जीना सीखो,
इज्जत जग में प्यारी है,
इज्जत गहना,कंगन हो,
इज्जत राज दुलारी है।
इज्जत सबकी होती है,
इज्जत का ख्याल कर,
बेइज्जती जब कोई हो,
नहीं कोई सवाल कर।
छोटा बड़ा जग में नहीं,
उम्र ही बस प्रमाण हो,
कोई भी सामने आता,
इज्जत और सम्मान दो।
इज्जत का फल इज्जत,
बुरा बोल मिलेगा बुरा,
अमृत का फल अमृत,
डरकर रहता दर्द भरा।
इज्जत के नहीं पेड़ हो,
इज्जत मिले निज हाथ,
इज्जत अगर करते रहो,
इज्जत मिले, देगी साथ।
अपनी इज्जत प्यारी है,
पर इज्जत का ध्यान दो,
कड़वा बोल, ना बोलो,
बेशक ही बलिदान दो।
वृद्ध की इज्जत करते हो,
नाम कमाओगे जगत में,
बुरे कर्म का फल बुरा है,
पता लग जाये आफत में।
इज्जत के बल इस जगत,
पाते रहते सभी जन नाम,
जिसकी इज्जत घर में ना,
वो हो जाए जगत बदनाम।
विष्णु भगवान सो रहे थे,
भृगु पहुंचे उनके ही द्वार,
जाकर प्रभु को लात जड़े,
समझी फिर भी निज शान।
विष्णु ने उन्हें माफ किया,
पूछा तब भृगु हाल चाल,
इज्जत भृगु नहीं की विष्णु
सुदामा जीवन रहा बेहाल।
हनुमत इज्जत की प्रभु की,
सदा रहे उनके दिल वास,
ताकत और बल बुद्धि से,
किया हनुमत दुष्टों का नाश।
सबरी ने झूठे बेर खिलाये,
रखकर मन में इज्जत भाव,
खेवट की इज्जत रखी प्रभु,
धोय पैर पीया चढ़ाये नांव।
इज्जत केकैई, कौशल्या की,
प्रभु श्रीराम ने रखी हरदम,
रजा दशरथ की इज्जत रख,
वनवास किया पिता के दम।
इज्जत और इजाजत दोनों,
अलग अलग कहाते नाम,
इज्जत को ना इजाजत हो,
उसका अपना होता काम।
इजाजत लेकर बड़े जन,
करना हरदम कोई काम,
बुजुर्ग दिलों में बसते रहे,
वो बनते दिल सुंदर धाम।
इजाजत सभा में लेकर ही,
बोलो सदा सभा अनुकूल,
इजाजत जगत में काम हो,
इजाजत लेना कभी न भूल।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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नई शिक्षा नीति
विधा-गीत
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गीत
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नई शिक्षा नीति आई,
बच्चों के मन को भाई,
थैला नहीं उठाएंगे,
शिक्षा स्कूल में पाएंगे।।
अ,आ,इ,ई हम सीखेंगे,
नहीं किसी पर झीखेंगे,
जो भी छात्र मिल जाए,
उसको ज्ञान सिखाएंगे,
थैैला नहीं...........
अब शिक्षा भी बोझ नहीं,
देशों में जा पढ़ो कही,
डिग्री लेकर ही आयेंगे,
जग को हम दिखलाएंगे,
थैला नहीं...............
खेल खेल में पढ़ लेंगे,
खूब ज्ञान हम पाएंगे,
भारत के देशभक्त बन,
जन जन साथ निभाएंगे,
थैला नहीं..............
नई शिक्षा नीति आई,
बच्चों के मन को भाई,
थैला नहीं उठाएंगे,
शिक्षा स्कूल में पाएंगे।।
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विषय-पितृ पक्ष
विधा-कविता
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आ गये हैं श्राद्ध दिन,
पितरों का करो तर्पण,
खुश कर लो देवों को,
मतना देखो अब दर्पण।
एक वर्ष में आते जब,
तन मन कर दो अर्पण,
खीर चूरमा अर्पित कर,
पूरा होगा तभी तर्पण।
पितृदेवों को रखो खुश,
हो जाएंगे बिगड़े काम,
वृद्ध जनों की सेवा ही,
बराबर हो यात्रा धाम।
पितृ पक्ष बड़ा निराला,
जीवों को मिले निवाला,
गाय, ब्राह्मण होते खुश,
पितरों को मत दो दुख।
हर पितृ को याद करो ,
यही कहलाए पितृपक्ष,
सुबह सवेरे खाना देकर,
फिर दाना पानी ले भक्ष।




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