Friday, September 18, 2020

 नशा
मुक्तक
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1.मात्राभार-21
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नशे ने मारे कितने, समझे नहीं जन।
गुजरे कभी ठेके करता उसका मन।।
खुशहाल जिंदगी जन जीना चाहिए,
करते रहो नशा, खत्म हो जाए तन।।

2.मात्राभार-24
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राजा महाराजा खत्म, नशे के जाल में।
खो देता है नशा, जन को हर हालात में।।
शुद्ध शाकाहार आहार करना चाहिए,
नशा करते रहो, जाना काल के गाल में।।
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स्वरचित, नितांत मौलिक
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-नशा
विधा-हाइकु
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1.
नशा है बुरा
भाग धतुरा सुरा
घोंपता छुरा
2.
जमीन गई,
सेहत रही नहीं,
नशे ने कही
3.
नशा जो करे
वही बेमौत मरे
जग भी डरे
4
जो करे नशा
मौत ने उसे डसा
घर ना बसा
5.
जगत कहता
नशा बुरा रहता
कष्ट सहता।
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नशा
विधा-दोहे
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           1.
नशा बुरा संसार में, छोड़ दो इसे आज।
वरना वो दिन दूर ना, नहीं रहेगा राज।।
            2.
नशा किया जिसने कभी, खत्म हुआ घर बार।
जग की नजरों से गिरा, हुई सदा ही हार।।
            3
जमीन सारी बिक गई, नशे का पाल रोग।
सेहत जन की खत्म हो, जीवन में दुख भोग।।

 




नशा
कविता
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नशा बुराई है, जगत में,
बचकर रहना, ले सीख,
बुराइयों ने जकड़ लिया,
मांगनी पड़ेगी फिर भीख।

भांग, धतूरा जमकर पीये,
पी रहे जमकर वो शराब,
परिवार  तक  दुखी रहते
होता निज जीवन खराब।

नशा समाज होता है बुरा,
नशा लेता अकारण जान,
नशा बुराई है देश खातिर,
होश में आ खुद पहचान।

धन दौलत, शरीर जमीन,
उस पर इज्जत चली जाए,
सब कुछ तबाह हो जाए,
फिर बेशक होश में आय।

छोड़ दो नशा अब आज,
नहीं बताई अच्छी चीज,
पैदावार न होने पाये तो,
खत्म करो इसका बीज।

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