Monday, September 21, 2020


दोहा
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लंबा जीवन लो चले, मंजिल अपनी एक।
रास्ते में मिलते कई, चलते मार्ग अनेक।।

बेटी बेटा मान ले, होते एक समान।
बदलों अपनी सोच को, अभी वक्त ले जान।।

बच्चे देश की शान हैं, बनाओ इन्हें महान।
अनपढ़ रखना भूल है, दो इनको भी ज्ञान।।

मां बाप की लाज की, रखते जो है शान।
वो बच्चे विद्वान हैं, बने देश पहचान।।



कवि और काव्य
कविता
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कौन है कवि--
*********
सूरज से भी तेज गति,
गणेश भांति चले मति,
पहुंचे झट जहां न रवि,
कहलाता वो ही कवि।

कल्पना लोक में घूमता,
निज कलम को चूमता,
तलवार धार हो कलम,
सिर कर दे झट कलम।

बातों का वो होता धनी,
गहरी सोच में रहे घनी,
काव्य से जन बहलाता,
वहीं तो कवि कहलाता।

मधुमक्खी भांति व्यस्त,
नहीं देता कोई भी कष्ट,
बुराई कर देता वो नष्ट,
काव्य में कर देता पस्त।

काव्य पर निकले वाह,
जिसकी बेहतर है छवि,
निज पराये में भेद नहीं,
कहाता सच्चा एक कवि।

जो फूल सा मुरझाता है,
नई कविता ले आता है,
बुराई को झट से काटता,
भरी भीड़ को वो डाटता।

कभी नहीं, वो माने हार,
काव्य,कलम से हो प्यार,
खरी सुना दे नहीं उधार,
बात एक के सोच हजार।

धन दौलत का ना भूखा,
खा लेता वो रूखा सूखा,
उसकी भाषा हो सलिल,
काव्य का लगता वकील।

दर्द सहता पर ना कहता,
अपनी धुन में मस्त रहता,
जिसके दिल में बसे अवि,
वो कहलाएगा मधुर कवि।

क्या है काव्य--
************
एक एक शब्द में भरा रस,
लोट पोट हो जा हँस हँस,
प्रफुल्लित हो मानव नस नस,
एक शब्द के अर्थ दस दस।

शब्द वार हो बम -तलवार,
बुराई का कर, देता है नाश
काव्य में भरा हुआ मीठास,
लगता कभी वो ही सुभाष।

मिलता काव्य में ज्ञान भरा,
बातों में उतरता सदा खरा,
सौम्य प्रकृृति का वो धनी,
मन खुशियों से मिले भरा।

जीते जी, शोहरत मिलती,
भाषा में भरा दर्द व खुशी,
शब्द लगके जैसे हो गहना,
ऐसे काव्य का क्या कहना।

काव्य में जड़े हीरे व मोती,
सुंदरता देख -देखकर रोती,
सभी रसों से भरा हो काव्य,
देश विदेश में कद्र भी होती।

कवि और काव्य दूध-पानी,
कवि काव्य दोनो कहे मान,
सदियों से कवि काव्य जान,
देश की करवाते हैं पहचान।।

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स्वरचित, नितांत मौलिक
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सरहद
विधा-कविता
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लो चला वो वीर सिपाही,
जा रहा सरहदों पर आज,
वीर देशभक्तों को रहता है,
निज मातृभूमि पर ही नाज।

अपने बदन का, खून दे दे,
बचाते निज वतन की शान,
प्राणों की आहुति पल में दे,
इतनी शूरवीरों की पहचान।

सोये होते हैं जब घरों में तो,
करते सरहदों की रखवाली,
कभी बमों के साये में जीते,
कभी झेलते रातें जो काली।

एक पलक भी चैन नहींं है,
कभी युद्ध में जाना है पड़ता,
बेशक अपनी जान भी जाये,
अपने पूरे जोश से वो लड़ता।

सरहदों के रखवालों को अब
आओ करे मिल आज प्रणाम,
माटी का मोल, चुका देते वो,
कर जाते हैं भारत मां का नाम।।
 

कवि और काव्य
विधा-कविता
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कौन है कवि--
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सूरज से भी तेज गति,
गणेश भांति चले मति,
पहुंचे झट जहां न रवि,
कहलाता वो ही कवि।

कल्पना लोक में घूमता,
निज कलम को चूमता,
तलवार धार हो कलम,
सिर कर दे झट कलम।

बातों का वो होता धनी,
गहरी सोच में रहे घनी,
काव्य से जन बहलाता,
वहीं तो कवि कहलाता।

मधुमक्खी भांति व्यस्त,
नहीं देता कोई भी कष्ट,
बुराई कर देता वो नष्ट,
काव्य में कर देता पस्त।

काव्य पर निकले वाह,
जिसकी बेहतर है छवि,
निज पराये में भेद नहीं,
कहाता सच्चा एक कवि।

जो फूल सा मुरझाता है,
नई कविता ले आता है,
बुराई को झट से काटता,
भरी भीड़ को वो डाटता।

कभी नहीं, वो माने हार,
काव्य,कलम से हो प्यार,
खरी सुना दे नहीं उधार,
बात एक के सोच हजार।

धन दौलत का ना भूखा,
खा लेता वो रूखा सूखा,
उसकी भाषा हो सलिल,
काव्य का लगता वकील।

दर्द सहता पर ना कहता,
अपनी धुन में मस्त रहता,
जिसके दिल में बसे अवि,
वो कहलाएगा मधुर कवि।

क्या है काव्य--
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एक एक शब्द में भरा रस,
लोट पोट हो जा हँस हँस,
प्रफुल्लित हो मानव नस नस,
एक शब्द के अर्थ दस दस।

शब्द वार हो बम -तलवार,
बुराई का कर, देता है नाश
काव्य में भरा हुआ मीठास,
लगता कभी वो ही सुभाष।

मिलता काव्य में ज्ञान भरा,
बातों में उतरता सदा खरा,
सौम्य प्रकृृति का वो धनी,
मन खुशियों से मिले भरा।

जीते जी, शोहरत मिलती,
भाषा में भरा दर्द व खुशी,
शब्द लगके जैसे हो गहना,
ऐसे काव्य का क्या कहना।

काव्य में जड़े हीरे व मोती,
सुंदरता देख -देखकर रोती,
सभी रसों से भरा हो काव्य,
देश विदेश में कद्र भी होती।

कवि और काव्य दूध-पानी,
कवि काव्य दोनो कहे मान,
सदियों से कवि काव्य जान,
देश की करवाते हैं पहचान।।

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स्वरचित, नितांत मौलिक
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सरहद
विधा-कविता
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लो चला वो वीर सिपाही,
जा रहा सरहदों पर आज,
वीर देशभक्तों को रहता है,
निज मातृभूमि पर ही नाज।

अपने बदन का, खून दे दे,
बचाते निज वतन की शान,
प्राणों की आहुति पल में दे,
इतनी शूरवीरों की पहचान।

सोये होते हैं जब घरों में तो,
करते सरहदों की रखवाली,
कभी बमों के साये में जीते,
कभी झेलते रातें जो काली।

एक पलक भी चैन नहींंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं है,
कभी युद्ध में जाना है पड़ता,
बेशक अपनी जान भी जाये,
अपने पूरे जोश से वो लड़ता।

सरहदों के रखवालों को अब
आओ करे मिल आज प्रणाम,
माटी का मोल, चुका देते वो,
कर जाते हैं भारत मां का नाम।।
 

प्रतियोगिता के लिए
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कवि और काव्य
विधा-कविता
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कौन है कवि--

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सूरज से भी तेज गति,
गणेश भांति चले मति,
पहुंचे झट जहां न रवि,
कहलाता वो ही कवि।

कल्पना लोक में घूमता,
निज कलम को चूमता,
तलवार धार हो कलम,
सिर कर दे झट कलम।

बातों का वो होता धनी,
गहरी सोच में रहे घनी,
काव्य से जन बहलाता,
वहीं तो कवि कहलाता।

मधुमक्खी भांति व्यस्त,
नहीं देता कोई भी कष्ट,
बुराई कर देता वो नष्ट,
काव्य में कर देता पस्त।

काव्य पर निकले वाह,
जिसकी बेहतर है छवि,
निज पराये में भेद नहीं,
कहाता सच्चा एक कवि।

जो फूल सा मुरझाता है,
नई कविता ले आता है,
बुराई को झट से काटता,
भरी भीड़ को वो डाटता।

कभी नहीं, वो माने हार,
काव्य,कलम से हो प्यार,
खरी सुना दे नहीं उधार,
बात एक के सोच हजार।

धन दौलत का ना भूखा,
खा लेता वो रूखा सूखा,
उसकी भाषा हो सलिल,
काव्य का लगता वकील।

दर्द सहता पर ना कहता,
अपनी धुन में मस्त रहता,
जिसके दिल में बसे अवि,
वो कहलाएगा मधुर कवि।

क्या है काव्य--
************
एक एक शब्द में भरा रस,
लोट पोट हो जा हँस हँस,
प्रफुल्लित हो मानव नस नस,
एक शब्द के अर्थ दस दस।

शब्द वार हो बम -तलवार,
बुराई का कर, देता है नाश
काव्य में भरा हुआ मीठास,
लगता कभी वो ही सुभाष।

मिलता काव्य में ज्ञान भरा,
बातों में उतरता सदा खरा,
सौम्य प्रकृृति का वो धनी,
मन खुशियों से मिले भरा।

जीते जी, शोहरत मिलती,
भाषा में भरा दर्द व खुशी,
शब्द लगके जैसे हो गहना,
ऐसे काव्य का क्या कहना।

काव्य में जड़े हीरे व मोती,
सुंदरता देख -देखकर रोती,
सभी रसों से भरा हो काव्य,
देश विदेश में कद्र भी होती।

कवि और काव्य दूध-पानी,
कवि काव्य दोनो कहे मान,
सदियों से कवि काव्य जान,
देश की करवाते हैं पहचान।।

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स्वरचित, नितांत मौलिक
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
सरहद
विधा-कविता
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लो चला वो वीर सिपाही,
जा रहा सरहदों पर आज,
वीर देशभक्तों को रहता है,
निज मातृभूमि पर ही नाज।

अपने बदन का, खून दे दे,
बचाते निज वतन की शान,
प्राणों की आहुति पल में दे,
इतनी शूरवीरों की पहचान।

सोये होते हैं जब घरों में तो,
करते सरहदों की रखवाली,
कभी बमों के साये में जीते,
कभी झेलते रातें जो काली।

एक पलक भी, चैन नहींं  है,
कभी युद्ध में जाना है पड़ता,
बेशक अपनी जान भी जाये,
अपने पूरे जोश से वो लड़ता।

सरहदों के रखवालों को अब
आओ करे मिल आज प्रणाम,
माटी का मोल, चुका देते वो,
कर जाते हैं भारत मां का नाम।।

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