जरा सुनो ............
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विषय-महंगी होती हरी सब्जी
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हरी सब्जियां महंगी हो रही हैं और कोरोना का भी डर है। ऐसे में किचन गार्डन में हरी सब्जी उगाने की आदत डाले। स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा।
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दोहा शब्द-धनार्जन
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करो धनार्जन रात दिन, देते जाओ दान।
धर्म कर्म जन साथ दे, जगत बने पहचान।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
दुख/पीड़ा/व्यथा/कष्ट
विधा-दोहे
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भूखे को रोटी मिले, फिर बूढ़ों को प्यार।
साधु संत का दुख मिटे, फिर से लो अवतार।।
पर्वों के इस देश में, जब आते त्योहार।
गम दुख सारे भूलते, दिल में भरते प्यार।।
जब दुख जन को घेरते, आता पतझड़ मास।
सूखे पेड़ नजर आये, आते कभी न रास।।
सुनकर दुख से मन भरा, खाक वो समाचार।
खबर उन्हें ही मानिये, दिल में उपजे प्यार।।
सुख दुख सरगम नाम है, जीवन है संगीत।
हॅँसकर गुजरे जिंदगी, कर ईश्वर से प्रीत।।
शिक्षा: कल आज और कल
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गुरु शिष्य के बीच में
अलौकिक होता प्यार,
गुरुकुल में पढ़ा करते,
बड़ा कुशल व्यवहार।
श्रीकृष्ण पढऩे जब गये,
संदीपन गुरु को प्रणाम,
श्रीराम पढऩे गये आश्रम,
वशिष्ठ महामुनि था नाम।
देवी देवता पढ़ते थे सभी,
गुरु देते थे उनको शिक्षा,
गुरुदेव की रोटी रोजी को,
मांगकर लाते थे वो भिक्षा।
शिष्य गुरु का आदर करे,
वो जमाना था शिक्षा का,
गुरु की हरेक बात सुनते,
फर्ज समझते थे शिक्षा का।
वर्तमान में गुरु नहीं रहे,
बन गये हैं सभी शिक्षक,
शिष्य भी घर जाते निज,
नहीं कहलाते हैं भिक्षक।
गुरु शिष्य के बीच अब,
ना रहा पहले का रिश्ता,
शिष्य की चक्की में देखो,
गुरु बेचारा खड़ा पिसता।
व्यवसाय बन गई शिक्षा,
व्यवसायी बने हैं शिक्षक,
अभी बदलाव का दौर है,
बन सकता है वो भिक्षक।
आयेगा वो समय में अभी,
शिक्षक शिक्षा बदल जाएंगे,
शिष्य घर पर बैठके अपना,
खूब ज्ञान ही बढ़ाते बढ़ाएंगे।
बुरा होगा आने वाला समय,
नहीं शिक्षक नहीं शिष्य होंगे,
घर में मोबाइल, टीवी को ही,
शिष्य उन्हें अपना गुरु कहेंगे।
शिक्षा: कल आज और कल
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गुरु शिष्य के बीच में
अलौकिक होता प्यार,
गुरुकुल में पढ़ा करते,
बड़ा कुशल व्यवहार।
श्रीकृष्ण पढऩे जब गये,
संदीपन गुरु को प्रणाम,
श्रीराम पढऩे गये आश्रम,
वशिष्ठ महामुनि था नाम।
देवी देवता पढ़ते थे सभी,
गुरु देते थे उनको शिक्षा,
गुरुदेव की रोटी रोजी को,
मांगकर लाते थे वो भिक्षा।
शिष्य गुरु का आदर करे,
वो जमाना था शिक्षा का,
गुरु की हरेक बात सुनते,
फर्ज समझते थे शिक्षा का।
वर्तमान में गुरु नहीं रहे,
बन गये हैं सभी शिक्षक,
शिष्य भी घर जाते निज,
नहीं कहलाते हैं भिक्षक।
गुरु शिष्य के बीच अब,
ना रहा पहले का रिश्ता,
शिष्य की चक्की में देखो,
गुरु बेचारा खड़ा पिसता।
व्यवसाय बन गई शिक्षा,
व्यवसायी बने हैं शिक्षक,
अभी बदलाव का दौर है,
बन सकता है वो भिक्षक।
आयेगा वो समय में अभी,
शिक्षक शिक्षा बदल जाएंगे,
शिष्य घर पर बैठके अपना,
खूब ज्ञान ही बढ़ाते बढ़ाएंगे।
बुरा होगा आने वाला समय,
नहीं शिक्षक नहीं शिष्य होंगे,
घर में मोबाइल, टीवी को ही,
शिष्य अपना अपना गुरु कहेंगे।
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फूल और कांटे
विधा-कविता
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फूल और कांटे, लगते हैं साथ,
सीखाते इस जग को एक बात,
दोस्त और दुश्मन मिलते साथ,
एकता अनोख,अनोखी है बात।
फूल और कांटे कहते हैं पुकार,
जग में सबसे उत्तम होता प्यार,
थोड़े समय जीना मतना परेशान,
मिलती है शिक्षा सुंदर हो शान।
फूल और कांटे देते जग शिक्षा,
दुश्मन को रखो पास हो सुधार,
डरना नहीं दुश्मन से कभी प्यारे,
वरना एक दिन निश्चित हो हार।
फूल और कांटे देते एक सीख,
खुशबू का गुण मांगे नहीं भीख,
सुंदर वस्तु की होती सदा कद्र,
बुरी वस्तु सदा पड़ी रहे बेकद्र।
फूल और कांटे दुनिया नजारा,
कुछ दोस्त होते साथ दे हमारा,
दुश्मन रूपी कांटे जग में सदा,
बुरे वक्त पर करते हैं किनारा।






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