Tuesday, September 29, 2020

 

जरा सुनो
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विषय- बेटी की समाज में भूमिका
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बेटी जग का मूल, बेटी घर का प्यार, बेटी बेटों से कम नही, बेटी है घर संसार।
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-दोहा शब्द-मुमकिन
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मुमकिन है इस देश में, पानी का व्यापार।
चालिस का लीटर मिले, बोतल में जलधार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

पवनपुत्र दोहा
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पवनपुत्र का नाम सुन, दुष्ट रुके ना एक।
परम भक्त श्रीराम के, मिलते रूप अनेक।।

पवनपुत्र का नाम लो, मिट जाएंगे पाप।
भक्ति भाव में डूब जा, जिसका मिले न नाप।।

पवनपुत्र रटते रहो, मिट जाए संताप।
संकटमोचन नाम है, हर लेते हैं पाप।।

बजरंगबली नाम लो, संकट में जब आप।
हर दिन शुभ ही मानते, पवनपुत्र का जाप।।



पहली मोहब्बत को, पहला खत जो दिल से लिखा था
विधा-कविता
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बात वर्ष 2000 की है। 21 नवंबर 2000 में मेरी शादी अलवर में हुई थी। अगस्त 2000 में हम लड़की को देखने गये थे। उस वक्त मोबाइल आ चुके थे। खैर अधिक बातें मोबाइल से ही होती थी किंतु मुझे याद है एक खत भी लिखा था। जो मेरी पत्नी ने 17 नवंबर 2010 को हुई उनकी मृत्यु तक संभालकर रखा था। आज उन्हें ही याद करते हुये कुछ अंश लिख रहा हूं।
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वास्तव में 1964 में संगम फिल्म आई थी जिसमें राजेंद्र कुमार एवं वैजंतीमाला पर फिल्माये गीत से प्रेरित होकर खत लिखा था जिसके बोल थे--
ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर
के तुम नाराज़ ना होना
के तुम मेरी जि़न्दगी हो
के तुम मेरी बंदगी हो
ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर
के तुम नाराज़ ना होना
के तुम मेरी जि़न्दगी हो
के तुम मेरी बंदगी हो.......शैलेंद्र सिंह
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  मेरा खत
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पढ़ाई करके थक चुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुका था,
मोहिनी सूरत बड़ी सुहाती है,
रात दिन नहीं सो पाता हूं मैं,
बस याद तुम्हारी तड़पाती है।

देखी तुम्हारी चांद सी सूरत,
सब भूख मेरी मिट जाती है,
जल्दी करके शादी कर लेना,
ये सर्द रात मुझे ना सुहाती है।

एक एक दिन तन्हाई में गुजरे,
हो रहा है, अब मेरा बदहाल,
कैसे दिल की, तुमको सुनाऊं,
डस लेगा मुझे वक्त और काल।

माता पिता से कह दिया अब,
बस करनी है तुमसे ही शादी,
तुम जीवन संगिनी बन जाओ,
बेशक फिर हो जाए बर्बादी।

दोस्तों को भी पसंद आई हो,
मेरी पसंद की, हो नंबर वन,
एक बार कहीं मिल पाये हैं,
दुबारा मिलने को करता मन

आशक्त हुआ न जान तुम पर,
कर दिया तुमने है जादू कोई,
लगता है तुम्हारा यह हाल है,
याद मेरी में तुम भी नहीं सोई।

जल्दी परिवार आएगा अलवर,
कर देगा तेरी रस्म गोद भराई,
एकांत में मेरे खत को पढ़कर,
ले रही होंगी तुम एक जम्हाई।

याद गर कभी तुम्हें मेरी आए,
कर लेना मेरे मोबाइल पे बात,
दिन में देखे कोई, बात चलेंगी,
अच्छा हो करना जब हो रात।

यह खत तुम संभालकर रखना,
याद दिलाएगा यह पहला प्यार,
अच्छा हो तुम भी मन की कहो,
न्यौछावर कर दूं बस जान हजार।

कई लड़कियां जीवन में देखी है,
पता नहीं क्यों हुआ दिल बेकरार,
करता हूं याद तेरा खिल खिलाना,
कुर्बान करूं तुम पर चंद्रमा हजार।

नहीं अमीर का, सुपुत्र हूं मैं कोई,
नहीं हूं मैं रांझा, नहीं हूं महिवाल,
पर इतना मुझे, यकीन हो गया है,
कर दिया तुम्हारे चेहरे ने बेहाल।

खत इतना ही काफी होगा अब,
कर लेंगे शेष मोबाइल पर बात,
पढ़ाई मेरी तुम, चौपट कर देती,
जब आती हो मेरे ख्वाबों में रात।

जल्दी ही शहनाई घर में बजेंगी,
बन ठनकर दूल्हा आऊं तेरे द्वार,
पहली मुलाकात बनी है मुहब्बत,
सदा अमर रहेगा दोनो का प्यार।

बहुत लिखा है, पूरा भरा है खत,
स्कूल मुझको जाना कैसे पढ़ाऊंगा,
शिक्षक साथी जब, मुझसे पूछे तो,
कैसे और क्या मैं उन्हें बतलाऊंगा।

मेरी नमस्ते ले लो, देना है जवाब,
बहुत हो गया बस,जाने दो जनाब,
कटते नहीं दिन, देखा जब शबाब,
कुछ दिन की बात,साथ मेरे ख्वाब।।
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चित्र पर आधारित
विधा-कविता
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बाल रूप होता है प्यारा,
लगता मन मोहक न्यारा,
कभी क्रोध रूप में आता,
कभी मन को खूब सताता।

बालक हो जिद के पक्के,
पर मन के बड़े ही सच्चे,
कभी कभी उनकी अदा,
मासूम चेहरे लगते अच्छे,

खेल खेलते हैं अनोखे,
पहनकर बनिया कच्छे,
उनकी तोतली भाषा में
लगते सचमुच वो बच्चे।

डरते ना कभी किसी से,
राजा हो या हो वे रंक,
उनके दिल उदार होते,
मारते नहीं नाग से डंक।

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