Sunday, September 27, 2020

 जरा सुनो
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सभी को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान की जाए ताकि अनपढ़ कोई न रहे। अपना काम स्वयं कर सके।
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दोहा***********************

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ब्याह सगाई मानते, किस्मत का सब खेल।
सुरलोक बने जोडिय़ां, हो मन आत्मा मेल।।

दर्पण देखा तो मिला, खूब भरे मन पाप।
पुण्य कर्म जो ना करे, मिलता उनको श्राप।।

दर्पण जब वो देखते, मिलते दिल में खोट।
करते रहना पाप तो, खूब मिलेंगे टोंट।।

बोलती कलम

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विधा----कविता
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हुक्का बार खुल गये हैं,
मार रहे हैं जगकर दम,
देख युवा, पीढ़ी फैशन,
मन विचलित होता गम।

बीड़ी सिगरेट व मसाला,
उस पर चिलम की घूंट,
देख युवा के कारनारमे,
ईश्वर भी जाता है रूठ।

ब्राउन शूगर, ड्रग लेना,
और हेरोइन को स्वाद,
खा पी रहे वो जमकर,
जिंदगी कर रहे बर्बाद।

शराब नशे ने खो दिये,
कितने पुरुष और नारी,
घर बर्बाद  हो चुके है,
रो रही है धरा हमारी।

सेहत अपनी खो रहे हैं,
घर अपना करते बर्बाद,
घर जमीन परिवार खत्म,
कैसा जीभ पड़ा है स्वाद।।
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विधा-कविता
शीर्षक-कलियुग
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समय बुरा आया है अब,
भविष्य क्या हो जाने रब,
बर्तन साफ करते हैं बच्चे,
मिले छुटकारा जाने कब।

सरकार ने लगाया हुआ,
प्रतिबंध, बच्चों से काम,
होटल, दुकानों पर देखों,
करे सरकार को बदनाम।

छोटे बच्चे काम कर रहे,
मां बाप पी रहे है शराब,
कैसा बुरा वक्त आया है,
भविष्य हो रहा है खराब।

मार खा रहे, गाली खाते,
दर्द में जी रहे, वो बेचारे,
दो जून की  रोटी खातिर,
फिर रहे हैं वो मारे मारे।

जागो वक्त अभी है यारों,
वरना फिर पछताते रहना,
बचाओ बच्चों का जीवन,
बीते वक्त फिर ना कहना।

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