Saturday, September 26, 2020

 दोहा ***********************

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जिम्मेदारी भूलना,पाप निशानी मान।
पुण्य कर्म तल्लीन हो,बढ़े जगत में शान।।

जिम्मेदारी मानकर, करते जो निष्काम।
पुण्य कर्म मन में बसे, समझो प्रभु के धाम।।

उजड़ चुका गुलशन धरा, आती नहीं बहार।
खुशबू तक भी ना रही, कौन करेगा प्यार।।



जब इश्क हो गया और पता भी नहीं चला
विधा-कविता
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मीठी सी चाहत में मन आज कहीं खो गया,
सोचता हूं जिंदगी में यह कैसे हो गया भला,
दो दिलों की धड़कन सुन-सुन मन सो गया,
जब इश्क हो गया और पता भी नहीं चला।

जज्बातों की आंधी होती कहलाता है इश्क,
एक दूजे की चाहत में, कुछ कर गुजरना है,
दोनों तरफ नफरत पले तो दिल लगता जला,
पर इश्क हो गया और पता भी नहीं चला।

हसीन दुनिया में कदम रखना ही होता इश्क,
नहीं गरीबी और अमीरी की चिंता सताती है,
एक पल नजर मिलती, समझो दिल में पला,
पर इश्क हो गया और पता भी नहीं चला!

पहली नजर में मिलने पर पलता आकर्षण,
मन ही मन रात दिन पलता है अनहद प्यार,
आकर्षित करने की होती है लंबी सी कला,
पर इश्क हो गया और पता भी नहीं चला।

आकर्षण के बाद तो पनपता है दिल रोमांस,
एक दूजे को रात दिन चाहते हैं होते पागल,
नजदीकियां बढ़ती जाती हैं सब जानते भला,
पर यह कैसे इश्क हो गया और पता न चला।

अगले पायदान पर आते हैं चाहिए एक धैर्य,
कर गुजरना अच्छा है, पर नहीं होना भावुक,
प्यार में खो जाते हैं दो दिल नहीं समझे बला,
पर यह कैसे इश्क हो गया और पता न चला।

फिर दो दिल इतने करीब हो अंतरंगता बनती,
बांटते हैं अनुभूतियां, एक दूजे के आकर संग,
मखौल चलता बातों ही बातों में ना हो गिला,
पर अजीब  इश्क हो गया और पता न चला।

फिर करते हैं वादे जब दिलों का बढ़ता इश्क,
पूरे करते हर वादे को चाहे मांग ले कोई चांद,
दो दिल कहेंगे वादे अनुसार सब कुछ है मिला,
पर अजब गजब इश्क हो गया पता नहीं चला।

इश्क भी अब मुहब्बत का रूप मानते हैं लोग,
पर इश्क भी जनाब होता है जगत में बुरा रोग,
खुशनसीब जन को जरूर कभी न कभी मिला,
आश्चर्य हुआ आज इश्क हो गया पता न चला।
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विलोम गीत
विधा-गीत
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लाभ हानि चलते साथ,
चले सदा इनकी बारात
कभी होती, हानि जन,
मानव के नहीं हो हाथ।

सुख दुख जीवन के अंग,
मानव देखे दोनों ही रंग,
चक्र रूप में चलते दोनों,
कहलाते हैं मानव अंग।

खुशी गम जीवन का सार,
कभी मिलते खूब ही गम,
कभी मिलता बहुत प्यार,
पर ना मिले खुशी उधार।

दोस्ती दुश्मनी चलती रहे,
कितने ही बन जाते दोस्त,
कितने बन जाते हैं दुश्मन,
कर देते हैं दर्द हमारे मन।।

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