कुंंडली छंद
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कुंडली -01
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लेकर माल विदेश से , स्वदेशी का प्रचार ।
समझ नहीं आया मुझे , यह कैसा व्यापार ।
यह कैसा व्यापार , मुझे बतलाए कोई ।
ऐसा करके काम , साख अपनी भी खोई ।
लूट रहे हो खूब , किसी को झाँसा देकर ।
अपना रहे बताय , माल गैरों से लेकर ।।
कुंडली- 02
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स्वदेशी चाहिए हमें , यह कैसा सामान ।
हेरा फेरी तो नहीं , सच बोलें श्रीमान ।
सच बोलें श्रीमान , हमें निर्भरता लानी ।
धारण कर अहसान , नहीं मिट्टी पिटवानी ।
गलत करें गर काम , लगे न्यायालय पेशी ।
होगा सफल कुटीर,होवे सब कुछ स्वदेशी ।।
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अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए
विधा-कविता
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हर इंसान को धरा पर ज्ञान होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए,
खून पसीना,दिन रात एक करता है किसान,
उसके पसीने बहाने पर अभिमान होना चाहिए।
कृषक से जग में सदा सद्व्यवहार होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर मान होना चाहिए।
सर्दी,गर्मी,बारिश,आंधी आये या फिर तूफान,
बैल,ऊंट या ट्रैक्टर पर कर देता है एक जान,
कभी आराम नहीं,तन पर फटे वस्त्र पहने वो,
पूरे देश और जगत की किसान होता पहचान,
न्यौछावर करे जवानी कुछ दान होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर..............................।
बच्चे भूखे रहते घर में नहीं तन पर पोषाक है,
मिट्टी में मिट्टी बनकर उगाए पेड़,झाड़ी शाक है,
सूखी रोटी,चटनी, छाछ या खाने में मिले अचार,
धरती मां उसकी प्यारी,बार बार करता चुचकार,
किसान की परिभाषा का विज्ञान होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर................................।
साहूकार और सेठ से लेता है वो ऋण बेचारा,
ओलावृष्टि,अधिक वर्षा, रोग,ठंड ने भी मारा,
कभी फसल बर्बाद हो, बीजाई हो खेत दुबारा,
कभी कभी तो राम माया पैदावार देखकर हारा,
ऐसे दृढ़ संकल्पी की बस हुंकार होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर.............................।
पैदावार जब कभी लेता किसान खेत से अपनी,
लग जाते सेठ पीछे करे उससे ठगने की कार,
उसकी महानता देखो, खाली न जाए उसके द्वार,
काम के लोढ़ में वो बच्चों से नहीं कर पाता प्यार,
ऐसे संत महात्मा गुणी का एतबार होना चाहिये,
अन्नदाता का धरा पर................................।
जब आता अन्न घर में अमानत बन जाता सारा,
बच्चों के वस्त्र खरीद रह जाता अर्धनग्न बेचारा,
अन्न बेचकर पैसे आते उतार देता जो ऋण उधारा
नहीं हाथ में पैसे होते देखों किसान किस्मत मारा
ऐसे एक भगवान का जन उपकारी होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर................................।
कितनों के बच्चे पढ़ लिखते हैं उसका रहता पीछे
कई बार उसका बेटा, बेटी महज खेत को सींचे,
सब्जी,अन्न,फल और कितने मेवे वो ही करे पैदा
उसको देख नेता,मंत्री,संतरी अपने हाथ को खींचे,
पूरी सृष्टि में किसान का सदा सम्मान होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर.............................।
अपने लहू से सिंचता धरा, मिल नहीं पाता मोल,
उसकी हर बात सोलह अन्ना सच्ची तराजू में ले तोल,
सबसे कम सम्मान जगत में होना चाहिए ज्यादा,
पूरा पैदा करे,अधूरा पैसा मिले,खाना मिलता आधा,
महा मानव,महा उपकारी तो आधार होना चाहिए,
अन्नदाता का धरा पर बस मान होना चाहिए।
मान होना चाहिए जी, अभिमान होना चाहिए।।
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हमारी भाषा हमारा अभियान
विधा-कविता
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हिंदी भारत का दिल, हिंदी माथे की बिंदी,
हिंदी बोले हिंदुस्तान, द्रविड़ हो या सिंधी,
हिंदी बिना अधूरा है, हिंदी बिना दुर्गत है,
हिंदी मन को मोहती , हिंदी है तो भारत है।
मातृभाषा यह कहाये, जन जन को हॅंसाये,
अंग्रेजी समझ न आये, हिंदी को अपनाये,
47 करोड़ बोलते लोग,हिंदी पढऩा है योग,
हिंदी में काम करोगे, अंग्रेजी का भागे रोग।
मधुर, सरल, सलिल,हिंदी भाषा लगे प्यारी,
हिंदी में बात करेगा, सभ्यता इसमें है हमारी,
हिंदी पढऩा लिखना सीख, वरना हो दुर्गत है,
हिंदी रथ के पहिये होते,हिंदी है तो भारत है।
संस्कृत है इसकी जननी, देवनागरी लिपि है,
कई भाषाओं के शब्द, जोड़े बतौर अतिथि हैं,
40 फीसदी भारत बोले,हिंदी की पड़ी लत है,
दिलोदिमाग पर घर करे, हिंदी है तो भारत है।
भारतीय संविधान में, हिंदी को दर्जा मिला है,
हिंदी की पहचान है हिंदी, भारत का तन मन,
हिंदी को बढ़ावा देना, विकास का करो पर्यत्न,
हिंदी एक दिव्य रथ है, हिंदी है तो भारत है।।
हमारी भाषा हिंदी, यह हमारा बने अभियान,
हिंदी भाषा राष्ट्रभाषा है, बनाती यही पहचान,
पढ़कर सुनकर हिंदी,आ जाती है तन में जान,
हिंदी पढ़ो और पढ़ाओ,यही सफल अभियान।




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