अनकही बातें
दोहे
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1.
सुने अनकही बात जब, मन में उठता जोश।
दर्द सहे फिर ना कहे, जन रहता खामोश।।
2.
कभी अनकही बात सुन, मन को होता दर्द।
कभी आवेश में लगे, असली होगा मर्द।।
3.
बातें चलती जब बुरी, पनपे मन में रोष।
अनकही बातें सुन कभी, किसको देंगे दोष।।
4.
कहीं हुई जब बात हो, मन में उठे हिलोर।
अनकही बातें जब चलें, फैलाए वो चोर।।
5.
मन हो दुखिया मानिये,सुने अनकही बात।
जोश जगे तन जोर से, कर दे दिन की रात।।
किसान
कविता
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जग की भूख मिटाये,
भोर हो खेतों में जाये,
मेहनत में नाम कमाए,
वही किसान कहलाए।
फटेहाल में वो रहता,
जग से कुछ ना लेता,
ऋण लेकर काम करे,
जग को अन्न वो देता।
बच्चे उसके भूखे रहे,
वो भी दुख बहुत सहे,
आंख से आंसू ही बहे,
दर्द किसी से ना कहे।
नमन आज उसको है,
जो दे जग को अनाज,
नतमस्तक उसके समक्ष,
देश को उस पर नाज।।
चित्रलेखन
कविता
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कविता-हिम्मत
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हिम्मत जिस जन में भरी,
रखता हौसलों की उड़ान,
रास्ता उसका नहीं रोकते
आंधी हो या फिर तूफान।
काल जिससे लड़ चुका,
भागा मुंह की जब खाय,
हिम्मत के हथियार बल,
देव, दानव भी जीते जाय।
पेड़ काट दे, तने से जब,
फिर से उत्पन्न हो कोपल,
इतिहास भरे हैं उदाहरण,
स्त्री भी नहीं हो कोमल।
हिम्मत जो भी हार जाय,
नहीं मिलेगा, कोई साथ,
हिम्मत उमंग जोश अगर,
देवता भी देते तब साथ।
आगे बढ़ो चलते ही रहो,
विवेकानंद का एक नारा,
देशभक्त कुर्बानी तक देता,
होता आंखों का वो तारा।।
दोहे
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1.
सुने अनकही बात जब, मन में उठता जोश।
दर्द सहे फिर ना कहे, जन रहता खामोश।।
2.
कभी अनकही बात सुन, मन को होता दर्द।
कभी आवेश में लगे, असली होगा मर्द।।
3.
बातें चलती जब बुरी, पनपे मन में रोष।
अनकही बातें सुन कभी, किसको देंगे दोष।।
4.
कहीं हुई जब बात हो, मन में उठे हिलोर।
अनकही बातें जब चलें, फैलाए वो चोर।।
5.
मन हो दुखिया मानिये,सुने अनकही बात।
जोश जगे तन जोर से, कर दे दिन की रात।।
किसान
कविता
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जग की भूख मिटाये,
भोर हो खेतों में जाये,
मेहनत में नाम कमाए,
वही किसान कहलाए।
फटेहाल में वो रहता,
जग से कुछ ना लेता,
ऋण लेकर काम करे,
जग को अन्न वो देता।
बच्चे उसके भूखे रहे,
वो भी दुख बहुत सहे,
आंख से आंसू ही बहे,
दर्द किसी से ना कहे।
नमन आज उसको है,
जो दे जग को अनाज,
नतमस्तक उसके समक्ष,
देश को उस पर नाज।।
चित्रलेखन
कविता
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कविता-हिम्मत
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हिम्मत जिस जन में भरी,
रखता हौसलों की उड़ान,
रास्ता उसका नहीं रोकते
आंधी हो या फिर तूफान।
काल जिससे लड़ चुका,
भागा मुंह की जब खाय,
हिम्मत के हथियार बल,
देव, दानव भी जीते जाय।
पेड़ काट दे, तने से जब,
फिर से उत्पन्न हो कोपल,
इतिहास भरे हैं उदाहरण,
स्त्री भी नहीं हो कोमल।
हिम्मत जो भी हार जाय,
नहीं मिलेगा, कोई साथ,
हिम्मत उमंग जोश अगर,
देवता भी देते तब साथ।
आगे बढ़ो चलते ही रहो,
विवेकानंद का एक नारा,
देशभक्त कुर्बानी तक देता,
होता आंखों का वो तारा।।




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