दोहा
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1.
दुर्योधन आवेश में, रखे सुलह प्रस्ताव।
केशव चर्चा छेड़ दी, माना बुरा सुझाव।।
2.
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टिड्डी जैसा जीव भी, बना दुश्मन किसान।
थाल,ढोल को पीट कर, रहे बचा निज धान।।
3.
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सावन की बरसात हो, बढ़े नमी तब खूब।
फसल खड़ी हो खेत जब, पैदा होती दूब।।
गजल
वज्र-2122 1122 22
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खूब करते जन मन की बातें।
कभी मन से हट जाती बातें ।।
एक दिन जग से जायेगा तू।
ना बची हैं तेरी कुछ रातें।।
तूझ को घमंड है इस रूप का,
सब पड़ी रह जाये सौगाते।
जब तेरा जग से जाना होगा।
दूर हटेंगे न गले लगाते।।
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*होशियार सिंह यादव
सौंदर्य
विधा-कविता
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सौंदर्य का भाव बड़ा
समझ सके गर कोय,
सौंदर्य की बात करे,
जगत में सुंदर होय।
प्रकृति है बड़ी सुंदर,
फल,फूल, देती खूब
हरी घास लान खड़ी,
कहलाती है वो दूब।
सौंदर्य से भरा हुआ,
विविधता भरा संसार,
सौंदर्य से परिपूर्ण हैं,
जग की चीज हजार।
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*होशियार सिंह यादव
काव्य
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जब हो दिल में समर्पण भाव, होती जग नैया पार,
जब भूले समर्पण भाव, निश्चित हो जाये जन की हार,
समर्पण हो जब विद्यार्थी का, खूब मिले उसे जग में नाम,
समर्पण के बल पर जग में, संपन्न होते कितने ही काम।
नर नारी के बीच समर्पण, बन जाता है घर एक धाम,
समर्पण हो भक्त देव का, बन जाते सब बिगड़े काम,
समर्पण जग में जरूरी है, ताकि जग में हो जन नाम,
दुष्ट, राक्षस, पापी घोर, समर्पण बिना होते बदनाम।
मीरा का समर्पण भाव, दर्शन हुये गिरिधर गोपाल,
सबरी का समर्पण निष्काम, प्रभु आये उनके धाम,
समर्पण राधा का संग केशव, जग में है अब तक नाम,
जिसमें नहीं मिले समर्पण भाव, उनकी हो जल्दी शाम।
समर्पण दूध का पानी से, मिलकर होता एक समान,
समर्पण सुदामा देखा तो, श्रीकृष्ण की बन गये जान,
समर्पण जब किसान खेत से, बोता खेत में सुंदर धान,
समर्पण जग का आधार है, समर्पण को सर्व गुण मान।।







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