मुक्तक
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1.
मानव का हुनर जब चले, होता जग में नाम।
जीत मिले निश्चित जहां, बन जाये सब काम।।
मानव का हुनर कला, दिखाता है नये रंग।
जग में सीखो हुनर कोई, नहीं लगता है दाम।।
2.
सीख लो जग में हुनर, करना फिर तुम राज।
हुनर नर कला ऐसी, कहलाता यह ताज।।
मानव का हुनर सदा, करा दे पूर्ण काम।
जो जन हुनर जानते,जग को होता नाज।।
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*होशियार सिंह यादव
दोहा
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1.
पुरवाई चलती हवा, हो जमकर बरसात।
गाये दादुर देख जल, खुश रहते दिनरात।।
2.
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खूब प्रशंसा सुन रहा, सैनिक नहीं गुमान।
देेश सुरक्षा मान कर, तन कर दे कुर्बान।।
3.
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काम वासना में रहा, अंतिम आई शाम।
मूर्ख कभी तो सोच ले, कर ले जनहित काम।।
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दर्पण
विधा-काव्य पद्य
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झूठा जगत, झूठी है शान,
आइना करे, सच पहचान,
दिल से झूठे, नकली ज्ञान,
खाली जेब, समझे धनवान।
करे आइना, जगत पहचान,
सोच ले,जग में, तू मेहमान,
कर ले धर्म, कर्म के काम,
एक दिन होगी,अंतिम शाम।
कितने आये, जग छोड़ गये,
अहित काम उन्हें सदा किये,
अपने स्वार्थ खातिर उन्होंने,
निर्धन जन के मन सता दिये।
देख ले आज, अभी आइना,
कितने भरे तेरे, मन में खोट,
सता सता जन, खून पी रहा,
पसंद तुम्हें पाप, चाहता नोट।
यह आइना, ही अब इंसाफ,
दुष्टों को नहीं करेगा यूं माफ,
दुश्मन रहित देश को बनाएंगे,
देश को, अब महान बनाएंगे।।
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गरीब हैं लापरवाह नहीं
काव्य पद्य
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गरीब हैं लापरवाह नहीं, देख लो आकर कही,
रोग फैले मार करता, समय पर बचाव हो सही,
लापरवाही बुरी बहुत है, आंखों से आंसू बही,
ऐतिहात बरतो जीवन में, लापरवाही सही नहीं।
खाने को नहीं दो रोटी, रोगों से बचना मुश्किल,
अमीर जन पैसों के बल,करता रहता खिलखिल,
नहीं गरीब का साथी कोई, प्रबंध नहीं कोई धन,
पर हिम्मत नहीं हारते, रखते सुंदर तन और मन।
मुख पर पत्तों का मास्क, प्राकृतिक और सुरक्षित,
देख लो विधि हमारी, ढूंढ ना पाये कोई शिक्षित,
देते आये मात आपदाएं, रोगों से नहीं हारते हम,
गरीब हैं लापरवाह नहीं,देख लो अपना भी दम।
गरीब होते मन के सच्चे, दिखावा कभी ना करते,
सच्चाई की राह पर चलते,बस मालिक से डरते,
रोक नहीं पायेगा रास्ता, बंदिश से कभी नहीं हारे,
सजग प्रहरी की भांति रहते हैं, प्रभु के हम प्यारे।।
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