दोहा-
******************************
**************************
उदित सूर्य मन मोह ले, जब रिमझिम बरसात।
रोशन होता जल व थल, मिटे तिमिर की रात।।
जरा सुनो
***********************
भौतिकवाद में जन की हालात कस्तूरी मृग से बदतर हो गई है जो धन को बढ़ाने के चक्कर में घूमता हुआ जान दे देता है।
**********************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
-तृष्णा
विधा -मुक्तक छंद
*************
तृष्णा जग में, होती बहुत बुरी।
तृष्णा को कहे, इक मीठी छुरी।।
पागल बना जन तृष्णा सामने,
तृष्णा से आत्मा, हो मरी मरी।।
तृष्णा जब धन की,पागल जन हो जाता।
तृष्णा जब काम की,नशा दिल पर छाता।।
जन का हाल भी बना, मृग तृष्णा जैसा ,
तृष्णा दिल पर सवार, कुछ न सुहाता।।
************************
*होशियार सिंह यादव
दोहा **************************
**************************
मौसम तेवर देखकर, ऑँसू बहे किसान।
काम करे वो खेत में, बना हुआ बेजान।।
**************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
मौसम तेवर देखकर , ऑँसू बहे किसान।
काम करे वो खेत में, बना हुआ बेजान।।
तेवर
***********************
तेवर सूरज देखकर, लगता हो बरसात।
नहीं यदि बरसात हो, दिन में हो जा रात।।
**************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
मौसम तेवर देखकर , ऑँसू बहे किसान।
काम करे वो खेत में, बना हुआ बेजान।।
तीखे तेवर संगिनी, शौहर बना गुलाम।
बेगम जब आदेश दे, करे दौड़कर काम।।
सपना/स्वप्र/ख्वाब
विधा-मुक्तक
***********************************
******************************
इंसान बने राजा, आते जब ख्वाब।
कभी कभी तो सपना बनाता नवाब।।
ख्वाबों का क्या कभी हॅँसाये, रुलाये,
कभी आते ख्वाब जिनका नहीं जवाब।।
हसीन सपने कभी मन को हर्षाते।
कभी सपने तो सोना भी बरसाते।।
सपने तो आखिरकार सपने होते,
कभी आते सपने जन को तरसाते।।
***********************
*होशियार सिंह यादव
सागर की लहरें
विधा-कविता
***************
सागर में लहरें उठे, मन में उठे हिलोर,
सावन आया झूम के,मचा हुआ है शोर,
भोर की लालिमा देख,मन हुआ विभोर,
लुक्का छिपी कर रहे, देख देख चितचोर।
सागर में लहरें उठी, बादल गरजे घोर,
बदली अंबर देखके, नृत्य करता मोर,
बिजली की चकाचौंध, छाई घटा घोर,
बरसे या ना बरसे, किसका चला जोर।
सागर में लहरें उठी, लेकर ज्वारभाटा,
नष्ट कर दिये तट भी, जन कहते टाटा,
भीग गया खाना भी, नहीं बचा आटा,
बिना कारण देखलो, कैसा लगा चांटा।
सागर में लहरें उठी, दे रही है संकेत,
ज्वार अगर आई तो, नहीं बचेगा खेत,
फसल तो बर्बाद हो, बच जायेगा रेत,
विनाश कगार खड़ा, अब तो आ चेत।
सागर की लहरें उठे, छोड़ा है उपहार,
उपजाऊ मिट्टी बचे, उससे करो प्यार,
मेहनत अगर कर ले, खुशी मने हजार,
उठ जाग, चल दे, मेहनत से कर प्यार।





No comments:
Post a Comment