Wednesday, July 29, 2020


विषय-कच्चा मकान
विधा-कविता
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होते थे कच्चे मकान, मन के जन थे पक्के,
समय बदला आज है,जन बन गये कच्चे,
धीरे धीरे खत्म हो गए, हो गया विकास,
इंसान का अब हो चला, मानो सर्वनाश।

कच्चे घर फूस के, चिडिय़ां करती बसेरा,
बारिश में आनंद से,खुशियों का था डेरा,
चिडिय़ां जन को जगाती, जब हो सवेरा,
सोते रहते पक्कों में, सुबह शाम नहीं बेरा।

सर्दी में थोड़ा दर्द था, गर्मी में था आराम,
एसी/कूलर सी हवा , देते थे सुबह शाम,
सरकंडों से छत बने,मन को था एक चैन,
पक्के मकान हो गये, तरसते  हवा को रैन।

माटी के थे कच्चे मकान, बारिश का डर,
झोपड़ पट्टी नाम था, कहते नहीं उन्हें घर,
आंधी बारिश में गिरे,  दबकर नहीं मरते,
पक्के कहीं न गिर जाए, इसी बात से डरते।

नहीं रहे नहीं मिले,ढूंढे से अब कच्चे घर,
पक्के मकानों में अब, गर्मी सर्दी का है डर,
बहुत खर्चीले हो गये,अब के पक्के मकान,
कच्चे दिल के रह रहे,समझते अपनी शान।

आयेगा फिर लौट,  एक दिन बीता जमाना,
लाख गुणा अच्छे थे कच्चे,हर जन ने माना,
पर अब देर हो चुकी है, इंसान ने पहचाना,
कुत्ते, बंदर,बिल्ली शोर, पक्कों में




है जाना।

झोपड़ पट्टी मिल जाती, बड़ बड़े होटल में,
झुंड,पान्नी,मूंज, जेवड़ी, खो गई दलदल में,
आधुनिकता की होड़ में, खो रहा है इंसान,
बहुत काम के कच्चे मकान,अब तो ले मान।।
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कच्चा मकान
विधा-कविता
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होते थे कच्चे मकान, मन के जन थे पक्के,
समय बदला आज है,जन बन गये कच्चे,
धीरे धीरे खत्म हो गए, हो गया विकास,
इंसान का अब हो चला, मानो सर्वनाश।

कच्चे घर फूस के, चिडिय़ां करती बसेरा,
बारिश में आनंद से,खुशियों का था डेरा,
चिडिय़ां जन को जगाती, जब हो सवेरा,
सोते रहते पक्कों में, सुबह शाम नहीं बेरा।

सर्दी में थोड़ा दर्द था, गर्मी में था आराम,
एसी/कूलर सी हवा , देते थे सुबह शाम,
सरकंडों से छत बने,मन को था एक चैन,
पक्के मकान हो गये, तरसते  हवा को रैन।

माटी के थे कच्चे मकान, बारिश का डर,
झोपड़ पट्टी नाम था, कहते नहीं उन्हें घर,
आंधी बारिश में गिरे,  दबकर नहीं मरते,
पक्के कहीं न गिर जाए, इसी बात से डरते।

नहीं रहे नहीं मिले,ढूंढे से अब कच्चे घर,
पक्के मकानों में अब, गर्मी सर्दी का है डर,
बहुत खर्चीले हो गये,अब के पक्के मकान,
कच्चे दिल के रह रहे,समझते अपनी शान।

आयेगा फिर लौट,  एक दिन बीता जमाना,
लाख गुणा अच्छे थे कच्चे,हर जन ने माना,
पर अब देर हो चुकी है, इंसान ने पहचाना,
कुत्ते, बंदर,बिल्ली शोर, पक्कों में यह है जाना।

झोपड़ पट्टी मिल जाती, बड़ बड़े होटल में,
झुंड,पान्नी,मूंज, जेवड़ी, खो गई दलदल में,
आधुनिकता की होड़ में, खो रहा है इंसान,
बहुत काम के कच्चे मकान,अब तो ले मान।।
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विषय-छंदमुक्त
विधा-कविता
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चला जा रहा,
कुछ अता ना पता,
कमर झुकी थी,
लिये हाथ में लाठी,
कभी इधर तो उधर,
सोच कमजोर
दिमाग पर लगा जोर
नहीं आया याद
पूछा राहगीर से
मुझे जाना कहा?
मैं कहां से आया हूं
मेरा ठिकाना कहा,
समझा मुसाफिर
बुढ़ापे की निशानी
सभी में आनी।
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