मुक्तक
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1.
गरीबी जो जन झेल रहा, उसकी पीड़ा कौन सहे।
हर रोज ही कष्ट में बीतता, ऑखों से अश्रु धार बहे।
सारे जग में एक से बढ़कर एक, कसक होती है।
भूखा प्यासा रहता,अपनी बीती वो किसको कहे।।
2.
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मेहनत करे, मिले ना सुख, होता तब दर्द है।
दिन रात खेतों में रहता, होता मौसम सर्द।।
कभी कभी तो करे प्रभु तबाह उसकी मेहनत।
मौसम की मार सहे, आखिरकार वो मर्द है।
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दोहा
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1.
मात-पिता हैं मायके, पति जेवर ससुराल।
नार नवेली के लिये, रखे सदा ही ख्याल।।
2.
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हरित दौर से देश में, हुआ कृषक खुशहाल।।
तकनीकी का खेल है, बदली उसकी चाल।।
3.
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होती जब बरसात है, भॅँवरे गाते गीत।
बादल नभ पर देख कर, मन में जागे प्रीत।।
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*होशियार सिंह यादव
दोहा****************************
1.
मात-पिता हैं मायके, पति जेवर ससुराल।
नार नवेली के लिये, रखे सदा ही ख्याल।।
2.
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दौर हरित जब देश में, हुआ कृषक खुशहाल।।
तकनीकी का खेल है, बदली उसकी चाल।।
3.
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होती जब बरसात है, भॅँवरे गाते गीत।
बादल नभ पर देख कर, मन में जागे प्रीत।।
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*होशियार सिंह यादव
काव्य पद्य
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प्रभु पर नहीं चलता जोर,
चाहे मचाओ कितना शोर,
रिश्ते नाते निर्भर उस पर,
रिश्तों की डोर, होना कमजोर।
कष्ट भी आते, चले जाते,
यह कहानी,विद्वान बताते,
फिर क्यों, मचाते हो शोर,
रिश्तों की डोर, होना कमजोर।
खेल जहां का, सभी खेले,
कुछ जन होते हैं अलबेले,
कुछ बन जाते हैं पापी घोर,
रिश्तों की डोर, होना कमजोर।
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*होशियार सिंह यादव
काव्य पद्य
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गाना सीखो, बजाना सीखो,
मुश्किल में मुस्काना सीखो,
देशभक्ति के ओजस्वी भाव,
दिल में कभी, लाना सीखो।
मंजिल दूर, चलना है बाकी,
हंसते गाते वहां, जाना सीखो,
थक हार कर मत, नहीं बैठो,
बस मंजिल पर, जान सीखो।
कठिनाइयां आये, रास्तों पर,
हंस कर उन्हें, भगाना सीखो,
मिले कभी मंजिल, राही को,
मंजिल जाके,मुस्काना सीखो।
प्रेम बसा होता, हर दिल में,
बस उसे ही, लुुटाना सीखो,
रूठ कोई, जब जाता घर से,
हाथ जोड़कर, मनाना सीखो।
जब कोई दर्द दे, मानव को,
झटपट उसे, समझाना सीखो,
मां, बाप,गुरु, दानी कहलाते,
तुरंत आशीर्वाद, पाना सीखो।




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