Friday, July 17, 2020

नियति
 दोहे
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हजार कोशिश फेल हो, नियति चले तूफान।
मन से बेशक हो खुश, मिट्टी मिल जा शान।।

टाल न सकता देव भी,      नियति का खेल।
पल में रोशन हो कभी, जब प्रभु से हो मेल।।

नियति का दौर हो बुरा, राजा बनता दास।
दुश्मन बनकर मारते, अपने हो जो खास।।

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*होशियार सिंह यादव




समय
विधा-दोहे
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समय के साथ जो चले, कहलाता है संत।
वक्त को अगर भूलता, निश्चित होगा अंत।।

वक्त बहुत है कीमती, करना मत बरबाद।
समय बीत जाये कभी, आए हरदम याद।।

छात्र खातिर कीमती,   नहीं करे बरबाद।
समय गया तो फेल हो, फिर आयेगी याद।।

समय कभी खोया जिसे, बिगड़े उसके काम।
लाख बुला ना लौटता, बेशक भज ले राम।।

समय बिजाई जो करे,      लेता पैदावार।
मौका चूके जन कभी, किसान की हो हार।।

आओ कर ले ध्यान अब, समय बड़ा बलवान।
खो देता जो वक्त को,  मिट्टी मिल जा शान।।

समय के साथ चल सदा, बनेगा होशियार।
दुनिया तुझको देख कर, करे खुशी से प्यार।

समय नहीं है रुक सका, लाखों करे प्रयास।
वक्त झुकाये ना झुके, बने नहीं यह दास।
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*होशियार सिंह यादव

जरा सुनो
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कर्मक्षेत्र बड़े व्यक्ति दिखावा नहीं करते हैं जैसे किसान अन्नदाता है जो पूरे जग का पेट भरता है किंतु टूटी चप्पल एवं फटे तन कपड़े होते हैं।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


दोहा****************************

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अपना तो कुछ दे नही, जग से चाहे लाख।
वो नर भागी पाप का, मिट जाती है साख।।

मानव योनी पाइये, हर जन का विश्वास।
वरना जग के लोग भी, नहीं बिठाते पास।।

खुद में बुराई वास है, जग में खोजे दोष।
पाप किया है जानता, खुद समझे निर्दोष।।





   फूल
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मन को पल पल हर्षाता,
खिलता है बागों में फूल,
गिरा, कुचला, धरती पर,
चाट रहा होता वहीं धूल।

विभिन्न रंगों में हो प्यारा,
बीज प्रक्रिया का हो मूल,
भंवरे, तितली आते वहां,
तोडऩे की ना करना भूल।

ठीक इंसान का बचपन है,
कहलाता है वो कली रूप,
गलियों में वह इठलाता है,
कभी छांव और कभी धूप।

एक दिन वह युवा बनता है,
हर जन को बड़ा हर्षाता है,
देखते ही देखते बुढ़ापा बैरी,
जन को सताने को आता है।

एक दिन वह मुरझा गिरता,
हो जाता है उसका भी अंत,
जीवन क्षण भंगुर कहलाता,
कह गये कितने  साधु संत।

सुकुमार कहलाता जगत में,
भंवरे व तितली लुभाता है,
इन फूलों को देख देखकर,
कभी रोना भी मन आता है।





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