Tuesday, July 21, 2020

जरा सुनो
********************************

********
************************
अकसर दूसरों को नीचा दिखाने की चाहत में इंसान इस कदर गिर जाता है कि लोगों को मुंह नहीं दिखा पाता।

बुराई और भलाई साथ चलती हैं। यदि तुम बुरा करना चाहों तो प्रभु भला करते देर नहीं लगाते हैं।
***********************
-होशियार सिंह यादव, कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


दोहे
*********************

********************
खुश मिलेगा जन कभी, संकल्प शक्ति पास।
हिम्मत मन से हारता, नहीं रहे तन सॉँस।। 

पास संकल्प शक्ति हो, कर लो सुंदर काम।
आगे बढ़ते जाइये, जग में होगा नाम।।

मानव शरीर पा लिया, अब कर अच्छे काम।
नहीं संकल्प शक्ति हो, कैसे हो जग नाम।।

सच्चे मन से काम ले, प्रभु को कर ले याद।
अगर संकल्प शक्ति है, क्यों करते फरियाद।।
**************************

*होशियार सिंह यादव


दोहा *********************************

*******************************
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।

नहीं खण्ड वर्षा जहांॅँ, न हो मूसलाधार।
नहरी पानी दूर हो,  फिर जीना बेकार।।

धरती पर पापी बढ़े, और बढ़े अन्याय।
प्रभु आएंगे देव बन, देने को जन न्याय।।
************************
*होशियार सिंह यादव


दोहा ************************

**
***********************
धरती पर पापी बढ़े, और बढ़े अन्याय।
प्रभु आएंगे देव बन, देने को जन न्याय।।
****************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा




 दोहा ************************

**********************************
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
****************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


बिंदु
*****************************

***************************
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
****************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन, हाल जगत का जान।।
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,बस इतना जग ज्ञान।।



खण्ड वर्षा
************************************

*************************
नहीं खण्ड वर्षा जहांॅँ, न हो मूसलाधार।
नहरी पानी दूर हो,  फिर जीना बेकार।।
**************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा


धरती पर पापी बढ़े, और बढ़े अन्याय।
तब आएंगे देव बन, देने को जन न्याय।।

नमन दोहा ************************
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
****************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा



शब्द-बिंदु
************************

बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
****************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा

बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन, हाल जगत का जान।।
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,यही जगत का ज्ञान।।
बिंदु रूप संसार था,  ज्योति पुंज भगवान।
ऊर्जा स्वरूप नाभि जन,बस इतना जग ज्ञान।।



खण्ड वर्षा
*************************

नहीं खण्ड वर्षा जहांॅँ, न हो मूसलाधार।
नहरी पानी दूर हो,  फिर जीना बेकार।।
**************************
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा





विधा-कविता/ मुस्कुराहट
******************************

***************************
शैतानी करते बच्चे, झलके खुशी आहट,
छोटी सी हंसी से, खिल उठे मुस्कुराहट,
कभी कभी तो बड़े भी, करे खटखटाहट,
वो भी हंसा देती है खूब, मन उठे चाहत।

बहुत कठिन हो चला, घर बाहर हंसना,
बातें जब करते जन, लगे नाग सा डसना,
दर्द में डूबा हर इंसान, हंसना गये हैं भूल,
उनके व्यवहार लगे, ज्यों फांसी गये झूल।

तितली, मकड़ी पकड़ ले, बच्चों को प्यार,
कभी घरौंदा बना तोड़ते, हंसी मिले हजार,
कुछ बोलते रो रहे हैं, हंसी दे दी है उधार,
हंसी-ठहाके लगा, मुस्कुराहट से कर प्यार।

कितना बदला है युग, हंसी भी मिले मोल,
जिस किसी से बात करो, बोले कड़वे बोल,
छोटे बच्चे की हंसी, कोनों में मिश्री दे घोल,
हंसी मिले खरीद लो,यह बड़ी है अनमोल।

हंस लो आज अभी, बच्चे की हंसी कहती,
हंसी धरा से रूठ गई, वो और  कहीं रहती,
देख देख जमाने को, आंखों से आंसू बहती,
हंसी ढूंढके लाओ, बच्चे की मुस्कान कहती।।
*******************

*होशियार सिंह यादव



शब्द चिंतन
विधा-कविता
***********
प्रदूषण





*****
बढ़ गया प्रदूषण, जीना हुआ मुहाल,
आये दिन रच रहा, मानव बुरी चाल,
वायु,पानी,धरा,ध्वनि, कर दिये बेकार,
प्रकृति शुद्ध न रही, जिससे जग प्यार।

प्रदूषण बोलबाला, मौत  सामने तैयार,
आए दिन आ रही हैं, आपदाएं हजार,
जल में जहर घुला है, मचा कोलाहल,
वायु भी दूषित हो गई, ना सामने हल।

गांव कभी जाने जाते थे, बढ़ गया शोर,
कौवा,गिद्ध,तोता गायब, भूला नाच मोर,
हर जन प्रदूषण करता, बने हैं पापी घोर,
पेड़ पौधे काट डाले, बचे न कीकर,थोर।

आएगा घोर युग,  घर-घर में घुले जहर,
पाप, दोष बढ़ जायेंगे, गांव हो या शहर,
हत्या, लूट, डकैती चले, आठों ही पहर,
बढ़ जायेगा फिर जगत, प्र्रकृति का कहर।

वक्त अभी बचा लो, घोलों मत नहीं जहर,
प्रदूषण कम करो, वृक्षों से भरो गांव शहर,
बचा लो सुंदर जग को, आयेगा कलियुग,
सतयुग के सपने देख, आएगा पाषाण युग।।

No comments: