Thursday, July 23, 2020

कविता
*************************

********************************
*********************************
कठिन हो गया जग में,
साथी संगी से भी प्यार,
न जाने कब दे दे धोखा,
मुश्किल करना एतबार।

अपना  बनकर काटते,
कहते जिनको  अपना,
दोस्ती  करना  जग में,
बन गया  एक  सपना।

किस पर विश्वास करे,
किसको कहे हम चोर,
जिस पर भी हाथ रखे,
वो है पापी जग में घोर।

अब तो अपनों पर भी,
नहीं कर सकते एतबार,
लाख प्रयास कर लेना,
होगी जन फिर भी हार।
****************************



कविता
****************************

**************************
*************************
सावन शुक्ल तृतीया, कहाए पर्व तीज,
हरियाली चहुं ओर, टिड्डे जाते हैं रीझ,
पूरे देश में पर्व मनाते,परंपरा है पुरानी,
शिव पार्वती की पूजा, सुनते हैं कहानी।

सावन के झूले पड़े, मन में उठे हिलौर,
झूला देती सखियां, छुप हुआ चितचोर,
सावन की घटा छाई, नाचे मन का मोर,
पानी लेने चल पड़े, बिजली चमके घोर।

हरियाली तीज आई,मिलती मिठाई घेवर,
आपस में बात करते, भाभी संग में देवर,
बतासों का उपहार,आये बेटी के ससुराल,
नई नवेली दुल्हन के, मन में एक सवाल।

दादुर सुर में गा रहे, टिड्डे छेड़े राग मल्हार,
साजन सजनी तरस रहे, ऑँखों में है प्यार,
एक साथ पड़ रही, नभ से बूंद कई हजार,
चकवा चकवी ताक रहे, अब डूबेंगे प्यार।

विरह में डूबी हुई, एक नवेली  झूला झूले,
सोच रही क्या बात हुई,साजन हमको भूले,
आये ना यह विरह की रात,करती है बेचैन,
जब विदेश से साजन आये,तब आयेगा चैन।
****************************



दोहे
**********

सावन के झूले पड़े, रिमझिम पड़े फुहार।
झूल रही हैं नारियां, साजन दिल में प्यार।।

नार नवेली झूलती, ले साजन का नाम।
दिल की बात दर्द दे, होती जब भी शाम।।

सखियां मन की कह रही, साजन है उस पार।
सावन के झूले पड़े, सजनी को है प्यार।।

बातें करती नारियां, साजन गये विदेश।
झूले भी अब कह रहे, चल साजन के देश।।
****************************


कुंडलियां
********
1.


झूला झूले नारियां, लेती झोले जोर।
सावन पावन माह में,टिड्डे करते शोर।।
टिड्डे करते शोर, बागों में  नाचे मोर।
करते बादल शोर,चमके बिजली घनघोर।।
बारिश फुहार पड़े,सखियों ने साजन भूला।
मच गई भागदौड़, बाग में  छोड़ा झूला।।

2.
झूला आया मायके, गौरी ने लिया डाल।
मजे ले रही झूल के, सखियां देती ताल।।
सखियां देती ताल, कभी आसमान छू ले।
सावन रिमझिम देख,खुद को सखियां भूले।।
शोर मचाती खूब, कभी खाती रसगुल्ला।
घर घर में है पड़ा, सावन पर्व का झूला।।

जरा सुनो
**************************

रोने से कष्ट दूर नहीं होते और हंसने से कष्ट पास नहीं आते फिर रोने का मार्ग त्याग करके कष्टों में मुस्कुराना सीखो।
****************************
-होशियार सिंह यादव, कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा

दोहा****************************

*******************************




चापलूस बन कर करो, हजम देश का माल।
मालिक को फिर मात दो, चलकर कोई चाल।।

हरी भरी जब हो धरा, आए सावन तीज।
झूला झूले नारियॉँ, वपन काल यह बीज।।

चापलूस बन काम ले, खा ले सारा देश।
वेश बदल कर भाग जा,लूटो ऐश विदेश।।




No comments: