Tuesday, July 28, 2020


विषय-क्रांति
विधा-छंद   दोहे
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क्रांति दिल में फूटती,
करे हाथ से वार।
सपना दिल में रख सदा,
मिले जहॉँ का प्यार।।

दुष्ट रुलाये जब कभी,
कष्ट देता हजार,
क्रांति दिल में जन्म ले,
करे पूरी उधार।।

सहे अंग्रेज मार तो,
चले उठा तलवार।
क्रांति देखी दुष्ट ने,
मानी पल में हार।।

गांधी, सुभाष देखकर,
विदेशी गये हार।
क्रांति के इस दौर में,
भगत मिला जग प्यार।।
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दोहा शब्द-मौसम
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एक तरफ इंसान है, आज हुआ बदरंग।
दूजे मौसम नाम है, पल में बदले रंग।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा




 पहली मुलाकात
विधा-कविता
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सोचा था चलो, देख आयेंगे शहर,
रुकेंगे वहा पर, खाना खाएं दोपहर,
अलबत्ता चार पांच हम, हुये सवार,
आपस में हंसते,पहुंचे थे शहर द्वार।

वर्ष 2000 की गर्मी, सताती रही घोर,
मृग मरीचिका दूर तक, नहीं था शोर,
मुरझाये से पेड़ लगे,  रुकते हम जाये,
कहीं पहाड़,कही रास्ता,घाटी से आये।

सुबह चले अलवर को,  दूरी कोस सौ,
गाड़ी जा रही तेज, 




कर रही थी पौ पौ,
कहीं रास्ते में पीया पानी, बढ़े थे आगे,
गर्मी में नींद आये, सोये कभी हम जागे।

जाना था जहां पहुंचे, उससे थोड़ा आगे,
जब देखा शहर आया, नींद से हम जागे,
जिस घर हमें जाना था,वो पीछे रह गया,
वर्षों बाद आये थे शहर,लगता नया नया।

पूछकर किसी से वापस, मोड़ चल दिये,
भूख लगी जोर की, खाने को कुछ लिये,
आखिर चालक ने कहा, देखो घर आया,
कहा हमने यह घर, मुश्किल से है पाया।

दस्तक दी दरवाजे पर, जन बाहर आया,
दिया परिचय अपना, वो जन मुस्कुराया,
दरवाजा खोला उसने, अंदर हमें बैठाया,
देखा घर बाहर तो, हमें तो पसंद आया।

मच गया शोर लो, मेहमान घर में आया,
कोई पानी ले आया,कोई खाना ले आया,
बारी बारी दे परिचय,फिर उसको बुलाया,
लेकर हाथों में पानी, एक मूर्त ने लुभाया।

पीकर पानी निहारा, कभी पैर कभी हाथ,
यही थी भावी पत्नी, हुई पहली मुलाकात,
सोचा कि अब पकडऩा, बस इनका हाथ,
मन में बस गई थी वो, होने को आई रात।

लेकर हमने विदाई,  चल पड़े घर की ओर,
पहली मुलाकात को, गाते रहे अंतिम छोर,
पहुंचे घर पर घायल, कहा यह शादी पक्की,
शादी के बंधन में बधे, कहलाएं हम लक्की।।

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