उन्वान रहबर
विधा- दोहें
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1.
जीवन रहबर जब बने, खिल जाते हैं फूल।
तम को पल में दे हटा, दूर करे सब शूल।।
2.
तलाश रहबर की रहे, बने जहॉँ में शान।
भटक रहा हूं आज तक, बनी नहीं पहचान।।
3.
रहबर जग में एक है, करता रहे प्रकाश।
जब चाहे वो दान दे, जीने के कुछ सांॅँस।।
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*होशियार सिंह यादव
प्रकृति
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खुशियां भर देता है प्रकृति का सौम्य नजारा।
कल कल करते झरने है, पर्वत देते हैं सहारा।।
दोहा ****************************
1.
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कलश देह को मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
पुण्य कर्म जब साथ हो, मिले स्वर्ग सा प्यार।।
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2.
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धर्म कर्म के नाम पर, करते हैं जो पाप।
मानव रूपी देव ही, मन से देते श्राप।।
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3.
*******
सावन मदमाता लगे, पड़ती कभी फुहार।
यौवन में जब भंवरा, करे फूल से प्यार।।
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*होशियार सिंह यादव
कलश
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कलश देह को मान कर,भर लो शुद्ध विचार।
पुण्य कर्म सेे लो सजा, पारस जन तैयार ।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
कलश
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कलश देह को मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
पुण्य कर्म जब साथ हो, मिले स्वर्ग सा प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
कलश
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कलश देह को मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
सुंदर विचार जन बॉँट दो, बढ़े जगत में प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
कलश
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कलश देह का मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
सुंदर विचार जन बॉँट दो, बढ़े जगत में प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
कलश
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तन को कलश मान ले, मन है अमृत समान ।
जग मेें हित का काम कर, कर्मभूमि ले मान।।
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तन को कलश मान ले, मन है अमृत समान ।
अमृत जगत में बाट दे, कर्मभूमि जग मान।।
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
तन को कलश मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
अमृत अगर जग बाटता, बढ़े जगत में प्यार।।
तन को कलश मान ले, मन है अमृत समान ।
अमृत वचन जन बाट दे, बढ़े जगत में प्यार।।
दोहा **************************
धर्म कर्म के नाम पर, करते हैं जो पाप।
मानव रूपी देव ही, मन से देते श्राप।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
भाईचारा
विधा-पद्य/काव्य
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हिंदु, मुसलिम,सिख और ईसाई,
महिला, पुरुष, लोग और लुगाई,
करे मेहनत खाते हैं निज कमाई,
नहीं बैर, आपस में हैं भाई भाई।
पापी,नीच,पाखंडी धर्म आड़ में,
बना रहे भाई भाई में एक खाई,
सारा हिंदुस्तान हमारा,लगे प्यारा,
इसकी तस्वीर, आंखों में बसाई।
इतिहास गवाह है, मिलकर लड़े,
अंग्रेजों के विरुद्ध चली थी आंधी,
जब नेहरु,भगत सिंह,सुभाष आये,
गांधी लेकर आया, था एक डांडी।
एकता की मिसाल रहा, जगत में,
नाम लेते हैं, डरते दुश्मन थर थर,
देशभक्ति की मिसाल कायम की,
देशभक्त, जवान मिलते हैं घर घर।
पहले था,आज है,आगे भी रहेगा,
भाईचारा देश के, रग रग में भरा,
भरत के नाम पर पड़ा देश नाम है,
सदियों से चमन, रहा यूं हरा भरा।।
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*होशियार सिंह यादव
-सड़क का वो मोड़
विधा-पद्य/काव्य
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पर्वतों से घिरा हुआ, सुंदर सजीली घटी,
चारों ओर पाषाण हैं, नहीं दूर तक माटी,
घुमावदार सड़क हैं, नहीं मिलता है तोड़,
ध्यान पलटा दुर्घटना, सड़क का वो मोड़।
कभी पर्वत से आते, डर लगता है भारी,
वाहन में जब चले, धड़कन बढ़े हमारी,
एक बार गई जिंदगी, नहीं मिले उधारी,
जीव जंतु हर धरा के,लगे जिंदगी प्यारी।
जब पहाड़ पर चढ़ते, फूल जायेगी सांस,
टेढ़ा मेढा हो रास्ता,नहीं आये कभी रास,
एक तरफ सुंदर पहाड़ी, दूजे संकट मोड़,
देख देख मन करता , जीवन का निचोड़।
जब चला रहे वाहन तो, रखो सदा ध्यान,
पलटा ध्यान अगर कही, ना बचेगी जान,
सड़कों पर मिलते हैं, कहीं पर ऐसे मोड़,
धीरे चलाओ वाहन, नहीं करो कोई दौड़।
सड़क का वो मोड़, जीवन का है निचोड़,
जीवन में आते रहते, कितने ही मोड़ तोड़,
बिना मोड़ के कभी, जिंदगी ना चल पाये,
जिंदगी का क्या कहना, हंसाये या रुलाये।।
विधा- दोहें
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1.
जीवन रहबर जब बने, खिल जाते हैं फूल।
तम को पल में दे हटा, दूर करे सब शूल।।
2.
तलाश रहबर की रहे, बने जहॉँ में शान।
भटक रहा हूं आज तक, बनी नहीं पहचान।।
3.
रहबर जग में एक है, करता रहे प्रकाश।
जब चाहे वो दान दे, जीने के कुछ सांॅँस।।
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*होशियार सिंह यादव
प्रकृति
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खुशियां भर देता है प्रकृति का सौम्य नजारा।
कल कल करते झरने है, पर्वत देते हैं सहारा।।
दोहा ****************************
1.
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कलश देह को मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
पुण्य कर्म जब साथ हो, मिले स्वर्ग सा प्यार।।
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2.
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धर्म कर्म के नाम पर, करते हैं जो पाप।
मानव रूपी देव ही, मन से देते श्राप।।
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3.
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सावन मदमाता लगे, पड़ती कभी फुहार।
यौवन में जब भंवरा, करे फूल से प्यार।।
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*होशियार सिंह यादव
कलश
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कलश देह को मान कर,भर लो शुद्ध विचार।
पुण्य कर्म सेे लो सजा, पारस जन तैयार ।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
कलश
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कलश देह को मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
पुण्य कर्म जब साथ हो, मिले स्वर्ग सा प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
कलश
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कलश देह को मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
सुंदर विचार जन बॉँट दो, बढ़े जगत में प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
कलश
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कलश देह का मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
सुंदर विचार जन बॉँट दो, बढ़े जगत में प्यार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
कलश
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तन को कलश मान ले, मन है अमृत समान ।
जग मेें हित का काम कर, कर्मभूमि ले मान।।
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तन को कलश मान ले, मन है अमृत समान ।
अमृत जगत में बाट दे, कर्मभूमि जग मान।।
-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
तन को कलश मान कर, भर लो शुद्ध विचार।
अमृत अगर जग बाटता, बढ़े जगत में प्यार।।
तन को कलश मान ले, मन है अमृत समान ।
अमृत वचन जन बाट दे, बढ़े जगत में प्यार।।
दोहा **************************
धर्म कर्म के नाम पर, करते हैं जो पाप।
मानव रूपी देव ही, मन से देते श्राप।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
भाईचारा
विधा-पद्य/काव्य
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हिंदु, मुसलिम,सिख और ईसाई,
महिला, पुरुष, लोग और लुगाई,
करे मेहनत खाते हैं निज कमाई,
नहीं बैर, आपस में हैं भाई भाई।
पापी,नीच,पाखंडी धर्म आड़ में,
बना रहे भाई भाई में एक खाई,
सारा हिंदुस्तान हमारा,लगे प्यारा,
इसकी तस्वीर, आंखों में बसाई।
इतिहास गवाह है, मिलकर लड़े,
अंग्रेजों के विरुद्ध चली थी आंधी,
जब नेहरु,भगत सिंह,सुभाष आये,
गांधी लेकर आया, था एक डांडी।
एकता की मिसाल रहा, जगत में,
नाम लेते हैं, डरते दुश्मन थर थर,
देशभक्ति की मिसाल कायम की,
देशभक्त, जवान मिलते हैं घर घर।
पहले था,आज है,आगे भी रहेगा,
भाईचारा देश के, रग रग में भरा,
भरत के नाम पर पड़ा देश नाम है,
सदियों से चमन, रहा यूं हरा भरा।।
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*होशियार सिंह यादव
-सड़क का वो मोड़
विधा-पद्य/काव्य
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पर्वतों से घिरा हुआ, सुंदर सजीली घटी,
चारों ओर पाषाण हैं, नहीं दूर तक माटी,
घुमावदार सड़क हैं, नहीं मिलता है तोड़,
ध्यान पलटा दुर्घटना, सड़क का वो मोड़।
कभी पर्वत से आते, डर लगता है भारी,
वाहन में जब चले, धड़कन बढ़े हमारी,
एक बार गई जिंदगी, नहीं मिले उधारी,
जीव जंतु हर धरा के,लगे जिंदगी प्यारी।
जब पहाड़ पर चढ़ते, फूल जायेगी सांस,
टेढ़ा मेढा हो रास्ता,नहीं आये कभी रास,
एक तरफ सुंदर पहाड़ी, दूजे संकट मोड़,
देख देख मन करता , जीवन का निचोड़।
जब चला रहे वाहन तो, रखो सदा ध्यान,
पलटा ध्यान अगर कही, ना बचेगी जान,
सड़कों पर मिलते हैं, कहीं पर ऐसे मोड़,
धीरे चलाओ वाहन, नहीं करो कोई दौड़।
सड़क का वो मोड़, जीवन का है निचोड़,
जीवन में आते रहते, कितने ही मोड़ तोड़,
बिना मोड़ के कभी, जिंदगी ना चल पाये,
जिंदगी का क्या कहना, हंसाये या रुलाये।।




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