विषय-बेवजह वह खपा हो गए
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विधा-कविता
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अपना उन्हें मानकर, करते आए वफा,
दिन रात एक किया, फिर भी हैं खफा,
वफा करते करते, दर्द में रोकर सो गये,
खता न कोई,बेवजह वह खपा हो गए।
प्यार किसी से हो बुरा, जग की है रीत,
जितनी से काम चले, उतनी बहुत प्रीत,
जग मयखाना है, जहां खा पीके सो गये,
कोई खता न,बेवजह वह खपा हो गए।
दोस्त आज दोस्त नहीं, दे जाते हैं धोखा,
छुरी बगल में रखकर, देखते रहते मौका,
अपनों की क्या बात, वो बेवफा हो गये,
खता न कोई, बेवजह वह खपा हो गए।
बहुत दर्द छुपा रखा, दिल भी है घायल,
जब दिल के टुकड़े हो, खनकाती पायल,
बस उनके लिए बेवफा भी, वफा हो गये,
खता ना कोई, बेवजह वह खपा हो गए।
खेलकूद में बीताये सारे,मधुर सुहाने दिन,
अब बुरा वक्त आया, बीते दिन गिन गिन,
किस पर विश्वास करे, साथी सब नये नये,
खता ना कोई, बेवजह वह खपा हो गए।
अब तो बनाना आशियाना, मिलेगी डगर,
जीवन लंबा झेल चुके, अभी बहुत सफर,
सफा जिंदगी के काटकर,हम तो ऊब गये,
साथी साथ छोड़,बेवजह वह खपा हो गए।
जिनको माना अपना था,वो भी रूठ गये हैं,
सोच सोचकर जगत की आंसू खूब बहे हैं,
दुश्मन तो दुश्मन होते हैं, दोस्त दुश्मन भए,
खता नहीं हुई है,बेवजह वह खपा हो गए।
आओ अब दुश्मनी भुला दे, बन जाए मीत,
दो कदम तुम चलोगे तो, बढ़ जाए मन प्रीत,
खुशियों के दिन थे जो, वो कैद ही बन गए,
न जाने क्यों साथी बेवजह वह खपा हो गए।
मौसम भी भीगा भीगा, पड़ती सावन फुहार,
एक बार तुम आ जाओ, आ जायेगी बहार,
मान भी जाओ जालिम , क्यों जुदा हो गये,
खता कोई नहीं, बेवजह वह खपा हो गए।
मंदिर
विधा-दोहे
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मन को मंदिर मान के, करो सदा शुभ काम।
गरीब मनुष्य धाम है, सेवा से हो नाम।।
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मंदिर माता मान लो, पूजा करना रोज।
लंबा जीवन पाइये, हर पल होगी मौज।।
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पूजा मंदिर कर सदा, नेक करो फिर काम।
नहीं पता किस मोड़ पे, हो जाएगी शाम।।
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नाम कमाओ लाख गर, थोड़ा कर लो दान।
मंदिर जाओ रोज ही, बढ़े सदा ही मान।।
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दोहा
27 जुलाई 2020
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पानी जन को सीख दे, मत ना करना बैर।
बहते जल में गिर गये, कर बचने की खैर।।
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--होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
मास्क लगा लो खींचके, बचना है गर रोग।
धूल,रोगाणु ना घुसे, जीवन रहे निरोग।।
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-होशियार सिंह यादव, लेखक,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
जरा सुनो
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भूख के कई प्रकार हैं किंतु सबसे खतरनाक भूख पेट की होती है जो न मिटने की स्थिति में इंसान हिंसक बन जाता है।
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-होशियार सिंह यादव, कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा
छंद मुक्त लेखन
दिनांक 27 जुलाई 2020
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लेखनी
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लेखनी की ताकत कभी छुपती नहीं।
लेखनी की ताकत कभी झुकती नहीं।।
वो लेखक ही क्या जो स्पष्ट नहीं लिखे,
लेखनी की ताकत कभी बुझती नहीं।।
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दोहा-आक्रोश
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कोड़ी कोड़ी जोड़ता, जन रहकर खामोश।
कोई धन को छीनता, बढ़ जाए आक्रोश।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना, महेंद्रगढ़, हरियाणा-
दोहा-
धर्म कर्म की बात पर, जन रहता खामोश।
देश लूटकर भागता, तब आए आक्रोश।।
कोड़ी कोड़ी जोड़ता,जन रहता खामोश।
धन पर डाका जब पड़े, तब पनपे आक्रोश।।
कोड़ी कोड़ी जोड़ता, रहकर जन खामोश।
कोई धन को छीनता, तब आए आक्रोश।।
कोड़ी कोड़ी जोड़ता, रहकर जन खामोश।
कोई धन को छीनता, बढ़ जाए आक्रोश।।
दोहा 2020
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चिंता चिता समान है, कर देती है अंत।
मन को शांत राखिये, जग में कहते संत।।
समाचार बिना जन सदा, रहता है अज्ञान।
पढ़े खोलकर देश की, मन मिटता अज्ञान।।
सावन रिमझिम कर रहा, गाये भोले गीत।
दादुर सुर की तान तो, लगती है संगीत।।





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