अन्नदाता
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दिनरात करे काम वो, भरता है भंडार।
लोग अन्नदाता कहे, माने कभी न हार।।
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-होशियार सिंह यादव,कनीना,महेंद्रगढ़,हरियाणा
विधा-दोहे
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कीचड़ में खिलता रहे,
धवल रूप सौगात।
कमल नाम जानते,
फूलों को दे मात।।
राष्ट्र पुष्प है देश का,
औषधियों का भंडार।
कमल सलोना रूप है,
कीचड़ से है प्यार।।
जोहड़,तड़ाग में मिले,
कमल जगत पहचान।।
अर्पित देवों को करे,
धवल रूप में शान।।
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दोहागजल
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महादेव मैं आ गया, याचक बनके आज।
चिंता मेरी दूर कर, जग में तेरा राज।
ज्ञान, ध्यान, से दूर हूं, देेना मुझको मान,
धर्म कर्म पर चल सकूं, नहीं चाहिये ताज।
पाप पुण्य में भेद कर, रखना मेरी लाज।
तेरी छाया में रहूं, रहे सदा ही नाज ।
लौट कभी ना जा सकूं, पड़ा रहूं मैं द्वार,
जनहित के इस काम मेें, नहीं चाहिये राज।
दरिया दिल शिव नाम है, करते सबके काज।
रूप त्रिनेत्र जब धरे, मिटे तख्त, जन, ताज।
दुखिया मैं संसार में, सुनो अर्ज तत्काल,
पड़ा हुआ अब द्वार हूं, इच्छा लेकर आज।
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*होशियार सिंह यादव
आशा की किरण
विधा-पद्य/काव्य
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तिमिर में डूबे थे, नजर नहीं आया,
कहीं क्रंदन,कहीं शोर,न हंस पाया,
शांत बैठा सोचा, एक दृश्य हर्षाया,
आशा की किरण, देख, दौड़ा आया।
रोग में डूब रहे,कुछ खाने को तरसे,
कहीं टिड्डी धावा,कहीं वर्र्षा न बरसे,
डर भय सता रहा, निकले न घर से,
दर्द में सुबह शाम, बीते कुछ अरसे।
एक सपना आया, दे गया वो सुझाव,
सुनकर उसकी बातें, बदले हावभाव,
उद्यत था कुछ करने, चढ़ गया चाव,
आशा की किरण, उतारेगी जग नांव।
हर वर्ग लगे हताश, मिले नहीं सांस,
करे भी तो क्या अब,चेहरा था उदास,
बैठे रहना फ्री तो, आता ना जग रास,
बदबू फैल रही, कहां से लाये सुबास।
आशा की किरण आई, मिट रहे कष्ट,
दुविधा सारी हटेंगी, गिर जाये पथभ्रष्ट,
चलेंगे मिलकर, नहीं तेरा है नहीं मेरा,
इंतजार करना अब, आयेगा नया सवेरा।।
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