Friday, May 01, 2020



प्रियतम
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जब प्रियतम मिले
आंखें हो दो चार
मन ही मन प्रसन्नता
मन में उमड़े प्यार,
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प्रियतम की बांहें भी
होती बड़ी सलिल
देख देख हर्षाते सभी
कभी न मिले ढील,
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प्रियतम जब आता है
मन में उठे तरंग
जब सम्मुख आ जाए
नैनों से फूटे रंग,
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प्रियतम की उम्र बढ़े
उभरे स्वर्ण रंग
सदा सदा वो संग रहे
रंग में न हो भंग।

*होशियार सिंह यादव


 मजदूर दिवस
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तन पर कपड़े फटे हुए
खाने को नहीं दो रोटी
हाय गरीबी मजदूर की
कैसी किस्मत है खोटी,
कई दिन भूखे प्यासे रहे
जब नहीं मिलेगा काम
भूख प्यास मिटा लेते हैं
बस लेकर प्रभु का नाम,
मजदूर की मजदूरी देख
आंखें भी हो जाएंगी नम
प्रभु की माया निराली है
कितना दिया उनको गम,
धनवान के घरों में  सदा
मजदूर करते हैं  मजदूरी
अपने सगे संबंधियों से
बनाए रहते सदा ही दूरी,
भूखे प्यासे उनके बच्चे
हाथ पसारने से डरते हैं
दवा अभाव में कभी तो
सड़कों  किनारे मरते हैं,
कोई ना सुने मजदूर की
गरीब बेचारे ये  सारे है
प्रभु की नजरों में तो ये
आंखों के कहाते तारे हैं,
कभी ना बनाना मजदूर
तरस खा कुछ भगवान्
इनका घर धन से भरो
खुश हो जाए तन -मन,
फटे हाल रहते  मजदूर
कोई तरस नहीं खाता है
इनकी माली हालत देख
धनी घर में छुप जाता है,
शत शत नमन करते हम
रखवाले देश के कहलाते
मजदूरी मिलती जब इन्हें
रोटी कपड़े खरीदके लाते,
इनके बच्चे मासूम कितने
होते हैं नन्हे भोले-भाले
तरस खा ले ओ भगवन्
कहाते तुम जग रखवाले।

*होशियार सिंह यादव



        मजदूर दिवस


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फौलाद से लिए दो हाथ
प्रभु का  मिलता है साथ
कठिन  काम करे पल में
मजदूर जन की क्या बात,
बड़े बड़े उद्योग पुकार रहे
ऊंची ऊंची पुकारती मिल
मजदूर कौम रहे जिंदाबाद
पल पल रहकर आते याद,
सबसे ज्यादा मेहनत करते
कठिन परिश्रम से ना डरते
खून पसीना करते हैं एक
दिल से बड़े है मजदूर नेक,
इतिहास बदलके रख देंगे
ये ऐसे मनमस्त तराने होते
दिनभर कड़ी मेहनत करके
रात्रि को नींद चैन की सोते,
नमन करो पावन माटी को
जिस पर मजदूर भाई होता
अगर मजदूर नहीं होता तो
अमीर आंसु बहाकर  रोता,
नमन आज उन मजदूरों को
जिनके बल पर देश महान
इस माटी में पैदा होते सदा
मजदूरों को सहस्त्र सलाम,
भगवान इंसान को दे जन्म
पर कभी ना बनाना मजदूर
अपने परिजनों का पेट भरे
रहते हरदम  अपनों से दूूर।


वर्ण पिरामिड
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मैं
एक नर
बन कर ही
घर पर आता हूं
अब मैं मीठे मीठे से
गीत सुनाकर ही निज घर को
कदम कदम सोचकर धीरे धीरे जाता हूं।

    2
तू
रोता है
अरे सोच मानव
जगत में जो आता
पड़ेगा जरूर ही उसे जाना
फिर अरे अधम जन तुझे क्यों
सोच सोच पड़ रहा है अब पछताना।




माहिया
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यार होते दिलदार
दुश्मनी से दूर
करते सदा ही प्यार,
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सारा हाल जानकर
हम रहे बेचैन
उसे ही पहचानकर,
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भेद नहीं बता पाए
दिल में रहा कैद
वो देेते हमें सजाएं
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पास पास रहकर के
भेद छुपाए रखा
सब कुछ कहकर के।


कविता
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भ्रम कभी न पालो
भ्रम पाप का मूल
भ्रम अगर दिल में
चुभता है ज्यों शूल,
संदेह किसी पर हो
देता है बड़ा ही दर्द
संदेह जो नहीं रखे
वही हो सच्चा मर्द,
संशय  अगर रहता
बनेंगे  कभी न काम
कितना भी श्रम करे
हो जाओगे बदनाम,
भ्रम से गर दूर रहो
हो जाएगा बेड़ा पार
वरना इस  जगत में
होगी हमेशा ही हार।।


मेहनत और मजदूर
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वर्षों से गरीब रहा मजदूर
शोषित किया रहा मजबूर
इच्छा दमन हुई चकनाचूर
व्यर्थ मेहनत, दुखी मजदूर,
उद्योगों को उन्हीं पर नाज
उन्हीं के बल चलता राज
राजा का होते वो ही ताज
बेबस हैं न उठाते आवाज,
सच में कमाते खाते है हम
बाबू में उनकी होता है दम
क्रोध में जब कभी आते हैं
तो लगे फूट गया कोई बम,
थोड़ी कमाई में करते समाई
आधे भूखे उनके मां व भाई
देश की इज्जत इन्होंने बचाई
जग में होती है उनकी हंसाई,
दिनभर उनका बहता पसीना
लगते हैं जैसे हीरे का नगीना
मेहनती की रोटी खाते ये सारे
मजदूर का सच्चा जीवन जीना,
मेहनत और मजदूर संगी साथी
चाहिए रोटी ना  घोड़े ना हाथी
इनका बड़ा रोल होता जगत में
यह बात पुकारे जगत की माटी,
आओ दे इन्हें इज्जत और प्यार
इनकी इज्जत ज्यों है धर्म हजार
हक देने को इनका रहना तैयार
करता राष्ट्र नमन इन्हें शत बार।
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