Saturday, May 30, 2020

बिटिया नहीं पराया धन
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अर्पित करती तन और मन, कैसे बिटिया पराया धन,
कभी सास-ससुर की सेवा, कभी रहता मायके मन,
धर्म निभाती दो परिवारों में, प्रसन्न रहता उसका मन,
इन हालातों को देखकर, बिटिया नहीं पराया धन।।
बच्चों को पाल पोस कर  ,परिवार आगे बढ़ाती है
कभी ससुराल में बिताए,  तो फिर मायके आती है,
मात पिता की सेवा तो,  पति सेवा में जुट जाती है,
देखकर समर्पण भाव को, बिटिया नहीं पराया धन।।
गया जमाना जब होती थी, बिटिया एक पराया धन
वर्तमान हालातों में, बिटिया दहेज, बिटिया ही धन,
कितना कष्ट उठाती है, प्रभु देखो कभी बिटिया बन,
यूं दिल बार बार कहता, बिटिया नहीं पराया धन।।
सीता भी एक बिटिया थी, द्रौपदी का सुंदर था तन,
अनुसुइया,द्रोपती कितने नाम, सुन कायल होगा जन,
इंदिरा,सरोजिनी,कल्पना ने,अर्पित किया देश को तन,
मां-बाप की प्रिय होती है, कैसे बिटिया पराया धन।।




 शेर

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दिल किसी यूं लगाते जाइये
रो रोकर हंसाते जाइये
दूर बैठे हैं दोस्त कितने
उनको पास बुलाते जाइये
दिल की तमन्ना दिल में रहती
तमन्ना को भुनाते जाइये।
तंबाकू निषेध दिवस
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विज्ञान प्रगति की खूब,नहीं सुधरा मानव।
पी पी बीड़ी सिगरेट,  बन रहा है दानव।।
बन रहा है दानव,     आनंद देता हुक्का।
पीकर दारू चिलम, फिर होते डुकमडूका।।
छोड़ दो मद्यपान,     बुजुर्ग यह देते ज्ञान।
सेहत बन जाये खूब,  बतलाता विज्ञान।।
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*होशियार सिंह यादव

आधुनिकता
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आधुनिकता है ऐसी, कर रहे आज द्वंद्व।
कभी लोकडाउन होय, कभी देश हो बंद।
कभी देश हो बंद,   कोरोना अति सताये।
श्रमिक काम छोड़ के,अपने घरों  को जाये।
बहुत दुखी पा लिये, कोरोना से झिझकता।
नहीं ़िमली है दवा, कहते हैं आधुनिकता।।
*होशियार सिंह यादव


तंबाकू निषेध दिवस
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विज्ञान प्रगति की खूब,नहीं सुधरा मानव।
पी पी बीड़ी सिगरेट,  बन रहा है दानव।।
बन रहा है दानव,     आनंद देता हुक्का।
पीकर दारू चिलम, फिर होते डुकमडूका।।
छोड़ दो मद्यपान,     बुजुर्ग यह देते ज्ञान।
सेहत बन जाये खूब,  बतलाता विज्ञान।।
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दोहें***
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 1.
जब जब आते युगपुरुष, खूब रचे इतिहास।
दुष्ट कभी देते दखल,   जग ना आया रास।।

2.
प्रकृति हुई जब तब कुपित, भीषण हुआ विनाश।
कहर ढ़हाया देखकर, मन हो बड़ा उदास।।

3.
चक्रवात के जाल में, ताकत मिले अपार।
ंफॅसते जन बचना कठिन, निश्चित मानों हार।।
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*होशियार सिंह यादव

शब्द-चक्रवात
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चक्रवात के जाल में, ताकत मिले अपार।
फॅसते जन बचना कठिन, निश्चित मानों हार।।
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*होशियार सिंह यादव

कहर
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 प्रकृति हुई जब तब कुपित, भीषण हुआ विनाश।
कहर ढ़हाया देखकर,        मन हो बड़ा उदास।।
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*होशियार सिंह यादव


गर्मी सता रही, करे नौकायान।
पल में गर्मी दूर हो, जब हो स्नान।।


जरा सुनों
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प्रभु ने इंसान बनाया है किंतु इस जहां में इंसान अपने को प्रभु समझ बैठने की भूल कर बैठता है। यही भूल तो पाप है




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--होशियार सिंह यादव, कनीना,हरियाणा--

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