Thursday, April 30, 2020



लालटेन
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तिमिर को मिटा देती
दिखलाती जन रास्ता
अंधेरे में चलना पड़े
पथिक का है वास्ता,
पुराने वक्त से चलती
चाहिए तेल व बाती
मित्र है एक दूजे के
गहरे हैं संगी-साथी,
इंसान की ये जिंदगी
लालटेन सी खिलती
तेल खत्म बाती बूझे
हस्थी माटी में मिलती,
रात अंधेरा दूर करती
लालटेन रखना साथ
रास्ता दिखला देती है
लालटेन की क्या बात।
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स्वरचित मौलिक रचना।
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*होशियार सिंह यादव

देश/ तिरंगा
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सब देशों में है न्यारा
लहराता तिरंगा प्यारा
इसलिए कहाए महान
जन-जन इसकी शान,
शहीदों का भारत देश
नहीं बचेगा गद्दार शेष
हर बच्चे  की कुर्बानी
याद रहे उनकी जवानी,
देश मेरे की यह कहानी
भारतवासी की  जुबानी
शहीदों ने खून से सींची
याद दिलाती है कुर्बानी,
अंग्रेजों से लड़ते लड़ते
कितनी फांसी खाई थी
दे देकर कुर्बानी अपनी
तब ये आजादी पाई थी,
आजादी है बहुत पुरानी
कहती है ये देश कहानी
आजादी खातिर वीरों ने 
कुर्बान की निज जवानी,
दुश्मन थर-थर कांपते हैं 
सामने जब वो आ जाते
उनकी रूह कांप उठती है
छाती पर तिरंगा फहराते,
भारत के तिरंगे को नमन
सब देशों में भारत महान
तन मन को अर्पित कर दे
भारत विश्व की एक शान।
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पनघट,घड़ा
विधा- छंदमुक्त
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कुंभकार
निज हाथों से
मुश्किल से इसे
बनाता
गाड़ी में रख कर
गांव गांव बेचने
 जाता,
दिन भर
मिट्टी लाकर
काट पीट घड़ा
बनाता
आवे में गर्म कर
खूब पका उससे
धन पाता,
मेहनत के
बेचकर घड़ा
100 रुपए पाता
इस राशि से
निज बच्चों के लिए
वह खाना लाता,
शिक्षक भी
ठोक पीठकर
विद्यार्थी जीवन
बनाता
पढ़ लिखकर विद्यार्थी
जीवन में सफल हो
जाता,
इंसान की
जिंदगी भी ऐसी
मिट्टी से आती मिट्टी में
 जाती,
हाय मिट्टी
जन-जन की
ऐसी एक यह कथा
सुनाती।

आओ थोड़ा जी लेते हैं
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कष्ट भरा होता है बचपन
घर से स्कूल जाना आना
टंकी का पानी पी लेते हैं
आओ थोड़ा जी लेते हैं....
धूप छांव पड़ती है सहनी
ओढ़कर कभी वृक्ष टहनी
कष्ट होता मुंह सी लेते हैं
आओ थोड़ा जी लेते हैं......
ठंड में कांपते हाथ व पैर
जाना पड़ता स्कूल-शहर
सर्दी पड़ती वो पी लेते है
आओ थोड़ा जी लेते हैं......
कभी बसंत बहार मिलती
घर आंगन कली खिलती
भंवरे कली रस पी लेते हैं
आओ थोड़ा जी लेते हैं.....
भाग दौड़ कर नहाते धोते
पढ़कर देर रात तक सोते
दूध और छाछ पी लेते हैं
आओ थोड़ा जी लेते हैं....
जीवन के होते लंबे रास्ते
काटने पड़ते हैं हंसते गाते
जहर गमों का पी लेते हैं
आओ थोड़ा जी लेते हैं......
तराने जीवन में याद रहेंगे
अपनी कहानी खुद कहेंगे
खुशी,गम, दर्द भी लेते हैं
आओ थोड़ा जी लेते हैं....
आओ थोड़ा जी लेते हैं।।
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पानी बचाओ
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ताई बोली ताऊ से.......
यूं बर्बादी जल की हुई
तो जल एक दिन खत्म
तो जन कैसे बच पाएगा
सूखा और अकाल  पड़े
जन मृत्युलोक में जाएगा,
लाख बताओगे बुरा लगे
नहीं समझ रहा यह जन
पाताल में जा चुका जल
दिनरात जल बर्बाद करो
फिर नहीं इसका है हल।
ताऊ बोला ताई से........
कहने को है 71 फीसदी
पीने योग्य नहीं यह सारा
वर्षा दिनोंदिन घटती जाए
काट डाले पेड़ पौधे फल
यही दुर्भाग्य होगा हमारा,
आएगा वो दिन जल्द ही
पानी खातिर हो फिर युद्ध
राशन दुकान  पर मिलेगा
नहाना, धोना भूल  जाएंगे
गलती का एहसास पलेगा,
देश जल का आयात होगा
पेट्रोल की भांति डलवाएंगे
सोच सोचकर करेंगे प्रयोग
घर में मेहमान लाया करेंंगे
प्यासे जन में होंगे कई रोग।
ताई बोली फिर ताऊ से.....
छीना झपटी होगी पानी की
हत्या करेंगे जल छीनने को
रात को घरों से  होगा चोरी
जल वाले जन धनवान होंगे
पर गंदे जल की न हो मोरी,
घोर कलियुग  आएगा फिर
विवाह शादी में दहेज पानी
जल खातिर मचे त्राहि त्राहि
जान के लाले पड़े हर कदम
जल खातिर लड़ेंगे भाई भाई।
ताऊ ने दिया अंतिम जवाब.....
जान बचाते फिरेंगे जन जन
सूखकर कांटा बनेगा बदन
भूख प्यास बनेगी महामारी
सृष्टि का लोप निश्चित होगा
पाषाण युग की होगी तैयारी,
वक्त अभी बचालो जल को
वरना भूल जाओगे कल को
जल दे जीवन जल ही रोटी
जल है तो  जन की कल्पना
जल अमृत, यही हीरा मोती।

जन्म दिन मुबारक
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विपत्तियां आए हजार
जीना हो जाए दुश्वार
मिले नहीं जगत प्यार
दोस्त हो जाए दो चार,
17 वर्ष पूरे  कर लिए
खुशी खुशी बिताना है
कांटों भरे रास्ते मिलेंगे
उन कांटों को हटाना है,
गम और खुशी आएंगी
जीवन में लख नजारे हैं
जीवन हमारा चार दिन
आप चमकते सितारे हैं,
आएंगे गर्मी के दिन भी
बीत जाएंगी यूं सर्द रात
बेशक जहां में हम न हो
आशीर्वाद रहे तेरे साथ।।








जरा सुनो

ज्ञान उस आभूषण के समान होता है जो सोने सी चमक भी रखता है, लोगों को आकर्षित भी करता है और धारण करने वाले जन को लाभ प्रदान करता है।



ध्यान
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ध्यान ज्ञान का सार है, ज्ञान गंगा की धार।
पढ़े ध्यान से मन लगा, कभी नहीं हो हार।।

नीर
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नीर नहीं जिन आंखों में, वो आंखें बेकार।
बसता आंखों में सदा, देश जहां का प्यार।।



 




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