मुक्तक
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1.
तेरा देश पुकार रहा,
छुप गये हो वीर कहां।
याद कर कुर्बानी को
प्रसन्न हो सारा जहां।।
2.
दुश्मन ने धाना बोला,
देश ने मोर्चा खोला।
तेरा देश पुकार रहा
वीरों ने पहना चोला।
3.
आगे बढ़ते जायेंगे
दुश्मन मार गिरायेंगे
तेरा देश पुकार रहा
कुर्बानी दे जायेंगे।
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*होशियार सिंह यादव
शृंगार
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रूप निखरता है औरत
तन का करती है शृंगार,
तभी तो मन प्रसन्न होये
प्रियतम का मिले प्यार।
शृंगार बगैर स्त्री अधूरी
करती वो सोलह शृंगार,
शृंगार के बल खुशियां
मिलती उसे कई हजार।
चांद जैसा यौवन खिले
चमक हो चांदनी जैसी,
शृंगारों से परिपूर्ण होयेे
स्त्री घर में सजती वैसी।
प्रकृति शृंगार करे जब
बसंत बहार ले आती है,
शोभा निराली देख देख
मन को बड़ा लुभाती है।
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*होशियार सिंह यादव
बचपन
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बचपन सुहाना याद आये
खेलते थे मिल गलियों में
कभी हंसते कूदते रहते थे
कभी नृत्य करे गलियों में।
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चोरी-छिपे फल खाते थे
लाते थे तोड़ तोड़ कर घर,
नहीं भूले हैं उन दिनों को
यादें रहे सदा सदा अमर।
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स्कूल से जब घर आते थे
किसी बाग में घुस जाते थे,
पत्थर और डंडे से तोड़के
मीठे मीठे फल यूं खाते थे।
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मित्रगण कई साथ होते थे
वो भी करते थे सदा मदद,
नहीं भूले हैं उन दिनों को
याद करके हो जाते गदगद।
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कभी शिक्षक की मार पड़े
कभी माता पिता सताते थे
फिर भी हम चोरी चुपके
इन बागों में छुप जाते थे।
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लौट के आएंगे नहीं दिन
ले लो चाहे लाख बलाएं
बस भूली यादों को अब
निज दिल पर खूब सजाये।
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*होशियार सिंह यादव
सुनो
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वक्त की नजरों से बचकर रहना चाहिए। न जाने यह कब राजा से रंक तो रंक से राजा बना दे।
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होशियार सिंह यादव, कनीना
घास
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गर्मी खूब सता रही, लेना कठिन सांस।
पंछी जल ढूंढ रहे, पशु ढूंढते घास।।
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*होशियार सिंह यादव
रास
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रोग की आंधी चली, नहीं मिले जन पास।
कैसे जन जीवन बढ़े, नहीं आ रहा रास।।
*होशियार सिंह यादव


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