Wednesday, May 27, 2020


नवल काव्य
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धरती से आकाश
बस गर्मी तपिश,
नौतपा ने तपाया
कोरोना आया
कैसा समय है,
सभी परेशान।
न कोरोना खत्म
नहीं गर्मी मिटी
बारिश जब आये
किसान हो खुश,
गर्मी मिटेगी
राहत मिलेगी।
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 प्रेम
विधा -कविता

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प्रेम के रूप हजार हैं
कहते प्रेम,प्रीत,प्यार,
यह अमूल्य चीज है
ना मिले कभी उधार।

ज्ञानी,साधू और संत
बता न पाये परिभाषा,
प्रेम के कारण ही रहे
मन अंदर अभिलासा।

प्रेम फूल सामान हो
पल में  ही मुरझाए,
प्रेम हीरे जैसा कठोर
तोड़ा भी नहीं जाए।

प्रेम बहुत  अगम है
प्रेम होता बड़ी पास,
प्रेम के चलते जग में
पत्नी का पति खास।

प्रेमिका- प्रेमी बीच
पलता दिलों में प्यार,
हजारों बंधनों में बंधे
ऐसा होता है इकरार।

प्रेम सुख-दुख सागर
पूरे जगत का आधार,
सृष्टि आगे जब चले
दिलों में पलेगा प्यार।।

जरा सुनो
***

दिल ना दुखाओ किसी का,
बसता है जन भगवान,
हर जन को ले साथ चले,
वो देव तुल्य है महान।।
**होशियार सिंह यादव,कनीना**

और का ही मचा है शोर।
पूरा न हो बेशक हो भोर।।


जरा सुनो
***

 जब सूरज बरसे आग,
झूलस जाये शाक।
शिकंजी पीओ जमकर,
बचाओ मुंह नाक।।।


शब्द-तपन
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तपन बढ़े जब लू चले, सूरज बरसे आग।
जेठ माह मुश्किल डगर, राही जल्दी जाग।।
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--होशियार सिंह यादव,कनीना,हरियाणा

 





कलियुग
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त्रेता में श्रीराम बन,       द्वापर में  गोपाल।
कलियुग मेें अवतार लो, देखों जग का हाल। ।

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