हरियाली हो खुशहाली हो
छंदमुक्त कविता
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प्रकृति मतवाली हो
रातें काली-काली हो,
जग का रक्षक माली हो
हरियाली हो खुशहाली हो।
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घनघोर घटाएं छाई हो
बूंदे जल की लाई हो,
फूलों की सजी थाली हो
हरियाली हो खुशहाली हो।
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हरियाली जब बढ़ती जाए
गीत मिलन के वो सुनाएं,
अंबर पर कोई लाली हो
हरियाली हो खुशहाली।
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रिमझिम वर्षा तुम्हें पुकारे
आओ चलकर पास हमारे
पवन चले मतवाली हो
हरियाली हो खुशहाली हो।
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*होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कोशिश
विधा-कविता
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कोशिश की जगत में
कुर्बानी को रहे तैयार,
प्यार मिला जगत का
नहीं छू पाई उसे हार।
कोशिश की जगत में
देर सवेर मिली जीत,
जग से न मिटे कभी
दुनिया गाती है गीत।
तुलसी बैठ गंगा तीर
रच डाली राम कथा
राम ने भी दर्शन दिये
पल में मिटाई व्यथा।
भागीरथ तप करके
गंगा को लाया उतार
पितरों का उद्धार कर
जगत का पाया प्यार।
कितने उदाहरण भरे
दे हिम्मत का पैगाम
मिटा सका नहीं उन्हें
उनका हुआ उद्धार ।
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*होशियार सिंह यादव
आत्मनिर्भरता
विधा- पद्य
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नहीं रुका है नहीं रुकेगा
कोरोना के इन घावों से,
आत्मनिर्भर रहता मानव
हिम्मत के हथियारों से।
खेतों में सुबह और शाम
करता रहे किसान काम,
आत्मनिर्भर रहता है वो
पूरे जग में कमाए नाम।
दुकानदार हो या ठठेरा
शिक्षक है या है सपेरा,
आत्मनिर्भरता से रहता
नहीं करे तेरा और मेरा।
हिम्मत करके कमाते हैं
दो जून की सूखी रोटी,
हाथ कभी नहीं पसारते
बेशक कटे तन से बोटी।
देश आत्मनिर्भर हुआ है
नहीं किसी पर वो निर्भर,
अमीर,गरीब,मध्यम वर्ग
निर्भर करे इन हाथों पर।
बच्चा बूढ़ा और जवान
लेते जब उठकर अंगड़ाई,
हिम्मत उनकी देख देखके
सरा जगत ही करे बड़ाई।
देश का बच्चा-बच्चा ही
हिम्मत से लेता रहा काम,
सुबह उठकर काम में लगे
करता काम जब हो शाम।
मोची, सुनार और सपेरा
हिम्मत करके कमाते रोटी
निज बच्चों का पेट पालते
चाहे किस्मत रह जा खोटी।
आत्मनिर्भरता अपनाने से
चेहरों पर आई है मुस्कान,
सिलाई, कढ़ाई और गृहणी
भारत की कहलाती हैं शान।
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*होशियार सिंह यादव
कुंडलियां (स्वतंत्र)
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कोरोना ने दी मार, हो गए जन बेचैन,
अपनों को तलाश रहे, कुछ बूढे से नैन।
कुछ बूढे से नैन, अब नहीं होते दर्शन,
दिल का टुकड़ा नहीं, होंगे कैसे प्रसन्न।
कहे सिंह कविराय, पूरी उम्र का रोना,
बुरी दे गया मार, जगत छाया कारोना।।
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*होशियार सिंह यादव
-बुनियाद
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धर्म-कर्म करते रहो, जग की हैं बुनियाद।
जग को जाये छोड़के, रहे सदा ही याद।।
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*होशियार सिंह यादव
-बुनियाद
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धर्म-कर्म करते रहो, जग की हैं बुनियाद।
जग से जाये छोड़ के, रहे सदा ही याद।।

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