मुक्तक
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कोरोना की मार पड़ी है, बेघर हुये कितने मजदूर,
रोटी रोजी को भूल गये, अपनों से हो गये वो दूर।
सौ सालों में इससे बढ़कर,कोई नहीं त्रासदी देखी,
सोचा नहीं यूं सतायेगा, इतना होगा यह रोग क्रूर।।
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*होशियार सिंह यादव
कविता
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वक्त बदलता रहता है
इंसान बदलते रहते हैं,
समझौता होता है जब
इंसान नयन भिगोते है।
समझौता जो कर लेता
वह कहलाता है महान,
समझौता चुक जाये तो
मूर्ख कहलाएगा इंसान।
इंसान कत्ल हो जाते हैं
फिर होता है समझौता,
समझौता दबाव में हो
जन दिल ही दिल रोता।
समझौते की घडिय़ा भी
कर देती है दिल बेचैन,
समझौता करने से कभी
मिलता नहीं कहीं चैन।
समझौता नहीं है मौका
वक्त की होती है पुकार,
जो समझौता कर लेता
उसे मिलता जगत प्यार।
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*होशियार सिंह यादव
सुगंध/सौरभ/खुशबू (त्रिपदी)
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दर्दे दिल का घर बना लिया यह शरीर।
दर्द में क्यों रोते हो यह गा रहा फकीर।
दर्द किसी को दे दे मांगता नहीं जमीर।
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बहुत छुपाते हैं दिल के भेंद।
दोस्त थाली में खा कर देते हैं छेद।
जीवन भर का दर्द दे जाता है खेद।
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बाग महकते हैं खुशबू बहुत आती।
बाग उजड़ते हैं खुशबू चली जाती।
बाग में है बैठ कोयल कभी गाती।
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बागों में आती रहती है सुगंध।
मन मुस्कुराता गाता है मंद मंद।
सूखे बाग चली जाती है सुगंध।
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*होशियार सिंह यादव
दाता *******
दाता का उपहार है, जन्म मिला इंसान।
मात पिता सेवा बड़ी,फर्ज इसे बस मान।।
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*होशियार सिंह यादव
परिवार
विधा-छंद कुडलियां
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प्रीत प्यार के तार से, बना हुआ परिवार,
सुख और दुख का साथी, होता है आधार।
होता है आधार, जगत का सुंदर नाता,
जुड़े हुये मां बाप, साथ बहन और भ्राता।
जुड़े हुये डोर में, जग गाये उसका गीत,
मधुर जग में नाता, बंधे एक बंधन प्रीत।
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सुंदर बंधन जगत में, हो रिश्तों की डोर,
कष्टों को सब पूछते, जब होती है भोर।
जब होती है भोर, चले तब पवन सुहानी,
एक रिश्ते में जुड़े, नहीं होती मनमानी।
करते रहते सहयोग, जैसे हो एक समंदर,
सदा रहे मुस्कान, परिवार बनता सुंदर।।
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